T-26

T-26/61 क्‍या जरूरी है वफ़ा कीजिए बस-नवनीत शर्मा

हज़रत ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी साहब की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया मुझसे इक बात किया कीजिए बस इस कदर मेहरो-वफ़ा कीजिए बस आफ़रीं सामने आंखें के मिरी यूं ही तादेर रहा कीजिए बस दिले-बीमार हुआ अब चंगा दोस्‍तो तर्के-दवा कीजिए बस ख़ूने-आशिक़ से ये परहेज़ उसे आशना-ए-कफ़े-पा कीजिए बस शर्म ता चंद हया भी कब […]

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T-26/60 जब सुब्ह का आलम है और रात ख़याली है-सलीम ख़ान

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया हर-चंद के बात अपनी कब लुत्फ़ से ख़ाली है पर यार न समझें तो ये बात निराली है आग़ोश में हैं वो और पहलू मिरा ख़ाली है माशूक़ मिरा गोया तस्वीरे-ख़याली है क्या डर है अगर उस ने दर से मुझे उठवाया कहते है तग़ीरी […]

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T-26/59 चलता ही नहीं प्यार का अफ़्सूं मिरे आगे-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया ख़ामुश हैं अरसतूं-ओ-फ़लातूं मिरे आगे दावा नहीं करता कोई मज़्मूं मिरे आगे लाता नहीं ख़ातिर में सुख़न बेहुदागो का एजाज़े-मसीहा भी है अफ़्सूं मिरे आगे बांधे हुए हाथों को बउम्मीदे-इजाबत रहते हैं खड़े सैकड़ों मज़्मूं मिरे आगे समझूँ हूँ उसे मुहरा-ए-बाज़ीचा-ए-तिफ़लां किस काम का है […]

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T-26/58 तूने ही दिल हलाक किया मैंने क्या किया -‘अयाज़’ संबलपुरी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया जीते ही जी को ख़ाक किया मैंने क्या किया अपने तईं हलाक किया मैंने क्या किया हैराँ हूँ मैं कि क्या ये मिरे जी में आ गया क्यों ख़त को लिख के चाक किया मैंने क्या किया ख़ंजर पे उसके रात गला जा के रख […]

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T-26/57 अपना ज़मीर बेच दूँ ? मर जाऊँ क्या करूँ-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया जीता रहूँ कि इश्क़ में मर जाऊं क्या करूँ तू ही मुझे बता मैं किधर जाऊं क्या करूँ है इज़्तेराबे-दिल से निपट अरसा मुझपे तंग आज उस तलक बदीदा-ए-तर जाऊं क्या करूँ हैरान हूँ कि क्यूंकि ये क़िस्सा चुके मिरा सर रखके तेग़ ही पे […]

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T-26/56 दोस्तों का ये प्यार कैसा है-सुख़नवर हुसैन ‘सुख़नवर’

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया दिल को ये इज़ितरार कैसा है देखियो बेक़रार कैसा है एक बोसा भी दे नहीं सकता मुझको प्यारे, तू यार कैसा है कुश्ता-ए-तेग़े-नाज़ क्या जाने ख़ंजरे-आबदार कैसा है हर घड़ी गालियाँ ही देते हो जान मेरी ये प्यार कैसा है मय नहीं पी कियूं छुपाते […]

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T-26/55 तबीयत है बहुत नाशाद मेरी-परवीन ख़ान

हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया नहीं करती असर फ़रियाद मेरी कोई किस तरह देवे दाद मेरी फ़ुग़ाने-जाँ ग़ुसिल रखता हूँ लेकिन नहीं सुनता मिरा सय्याद मेरी तु ऐ पैग़ामबर झूटी ही कुछ कह कि ख़ुश हो ख़ातिरे-नाशाद मेरी मैं तुझको याद करता हूँ इलाही तिरे दिल में भी होगी याद मेरी […]

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