T-21

T-21/44 ख़याल ही में हों लेकिन हों रास्ते रौशन-तुफ़ैल चतुर्वेदी

दोस्तो ! ढाई शेर जब ये मिसरा सूझा था तो इस ज़मीन को चैक करते वक़्त कह लिये थे. बाक़ी अभी हाथो-हाथ का काम है. जैसा बन पड़ा हाज़िर है. ख़याल ही में हों लेकिन हों रास्ते रौशन ‘क़लम संभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन’ यही जगह है जहाँ यार आ के बैठते थे इसी […]

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T-21/43 बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन-नवीन सी. चतुर्वेदी-3

बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन न जाने किस के हुनर से चराग़ थे रौशन जो उस का काम है उस ने वही किया साहब बुझे हुओं को जला कर बुझा-दिये……. रौशन शबे-विसाल तो आँखों पे ख़्वाब हावी थे शबे-फ़िराक़ भी दीदे न हो सके रौशन किसी के दिल में जो […]

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T-21/42 जले दिये थे कि दुनिया ये हो सके रौशन-पवनेंद्र पवन

जले दिये थे कि दुनिया ये हो सके रौशन क्‍यों घर ये कुछ ही यहां फिर हैं हो सके रौशन मरी नहीं है अभी आस तेरे आने की अभी रखे हैं सभी घर के रास्‍ते रौशन हों फुलझड़ी की तरह मन में क़ाफ़िये रौशन तू साथ है तो हैं ग़ज़लों के क़ाफ़िले रौशन क्‍यों मुफ़लिसी […]

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T-21/41 जो अपना नाम किसी फ़न में कर गये रौशन-देवेंद्र गौतम

जो अपना नाम किसी फ़न में कर गये रौशन उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर हैं क़ाफ़िले रौशन ये कैसे दौर से यारब गुज़र रहे हैं हम न आज चेहरों पे रौनक़ न आइने रौशन किसी वरक़ पे हमें कुछ नज़र न आयेगा किताबे-वक़्त में जब होंगे हाशिये रौशन हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है किसी […]

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T-21/40 क़लम सभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन-शाहिद हसन ‘शाहिद’-2

क़लम सभाल अँधेरे को जो लिखे रौशन तभी तो होंगे मुहब्बत के सिलसिले रौशन हम अपने बच्चों को नफरत से दूर ही रख्खें इन्ही को करने हैं कल देश के दिए रौशन हज़ार अपने मुक़द्दर से मैं लड़ा लॅकिन हुए न फिर भी ग़रीबी के हाशिये रौशन ये आज़मा चुके आपस में जंग कर के […]

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T-21/39 अगर निगाह के हो जायें ज़ाविये रौशन-शाहिद हसन ‘शाहिद’

अगर निगाह के हो जायें ज़ाविये रौशन नज़र हयात के आयेंगे दायरे रौशन बढो तो अज़्मे-सफ़र ले के जानिबे-मंजिल दिखायी देंगे तुम्हें अपने रास्ते रौशन इक उम्र इनके लिये ख़ूने-दिल जलाया है ग़ज़ल के क़ाफ़िये यूँ ही नहीं हुए रौशन किसी की जलवानुमाई का मोजज़ा कहिये दिखायी देते हैं ज़र्रे भी चाँद से रौशन रविश […]

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T-21/38 जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन-आलोक मिश्रा

जो दिल के ताक़ पे रक्खे हैं कुछ दिये रौशन उन्हीं से हैं मिरी साँसों के सिलसिले रौशन इक आफ़ताब का टुकड़ा था दिल हमारा कभी थे इसके नूर से हस्ती के दायरे रौशन बहुत अज़ीज़ मुझे है ये ख़स्तगी अपनी इसी सबब तो हुए मेरे मर्सिये रौशन अभी भी ख़ुद से मैं बातें तवील […]

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