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T-1/28 आदतन धोखा दिया उसने मगर मैं चुप रहा – तिलक राज कपूर

भोपाल निवासी आ. तिलक भाईसाब ने ये ग़ज़ल सिर्फ़ एक घंटे में ही कही है। क्या शानदार अशआर निकाले हैं। भाईसाब लफ़्ज़ परिवार आप का सहृदय स्वागत करता है। इल्म-ओ-अरूज़ के जानकार तिलक राज़  कपूर जी का हमसे जुड़ना बेहद ख़ुशी का सबब है। प्रणाम मान्यवर।   लोग कहते हैं कि अक्‍सर सोचता रहता हूँ […]

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T-1/27 रात भर ये किन सदाओं में घिरा रहता हूँ मैं – मनीष शुक्ल

रात भर ये किन सदाओं में घिरा रहता हूँ मैं नींद में भी जाने क्या क्या बोलता रहता हूँ मैं हो गयी कैसी ख़ता मुझसे जुनूने-इश्क़ में अपनी तन्हा वहशतों से पूछता रहता हूँ मैं याद का पर्वत, मुसलसल आंसुओं की बारिशें एक धारा हूँ कि खुद को काटता रहता हूँ मैं जानलेवा है फ़साना […]

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T-1/26 एक गर्दिश में मुसलसल मुब्तला रहता हूँ मैं – डॉ . लियाक़त जाफ़री

एक गर्दिश में मुसलसल मुब्तला रहता हूँ मैं रोकती रहती है दुनिया, दौड़ता रहता हूँ मैं एक नुक्ते में सिमटने तक हैं सारी काविशें इस सिमटने के अमल में फैलता रहता हूँ मैं  रात भर आंसू बहाता है मेरा हमज़ाद, एक  रात भर अपने बदन में झांकता रहता हूँ मैं माफ़ तक करता नहीं मैं जल्द अपने आप को खुद से लड़ लूँ तो कई दिन तक खफा रहता हूँ मैं   और फिर इक दिन मसीहाई गंवाती है असर  बाद उस के मुद्दतों बेमोजिज़ा रहता हूँ मैं  […]

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T-1/25 आब पर रोग़न के जैसा तैरता रहता हूँ मैं – डा.मुहम्मद ‘आज़म’

आब पर रोग़न के जैसा तैरता रहता हूँ मैं यानी सब के साथ रह कर भी जुदा रहता हूँ मैं हैं इसी की वज्ह से महरूमियाँ,नाचारियाँ देखता हूँ कब तलक ज़ेरे-अना रहता हूँ मैं तेरे होने का जहां होता नहीं एहसास भी वसवसों के उस जहां में ए ख़ुदा रहता हूँ पूछ मत कैसी है […]

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T-1/24 एक कतरे को नदी में ढूँढता रहता हूँ मै – दिनेश नायडू

एक कतरे को नदी में ढूँढता रहता हूँ मै इसलिए तो खुद में ही सिमटा हुआ रहता हूँ मैं ये नहीं है की हमेशा मसअला रहता हूँ मैं हाँ यकीनन भीड़ से थोड़ा जुदा रहता हूँ मैं ये हरापन ,ताजगी,गिरते हुए पत्तों में क्यूँ , कितनी कुदरत बेमहर है सोचता रहता हूँ मैं आप पर […]

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T-1/23 तीरगी-सी कुछ लकीरें खींचता रहता हूँ मैं – आदिल रज़ा मंसूरी

तीरगी-सी कुछ लकीरें खींचता रहता हूँ मैं रौशनी के उस तरफ़ जब-जब खड़ा रहता हूँ मैं कोई भी मौसम मुकम्मल कर नहीं पाया मुझे कोई भी मौसम हो लेकिन अधखिला रहता हूँ मैं आज भी पाता नहीं हूँ दाखिले का हौसला जंगलों को दूर ही से देखता रहता हूँ मैं क्या समंदर को मिला है […]

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T-1/22 मुझसे बाहर मुझको समझा जाए ये मुमकिन कहाँ – अभिषेक शुक्ला

पहले कुछ दिन तक तो जंगल की हवा रहता हूँ मैं फिर किसी ख़ुशबू के क़दमों में पड़ा रहता हूँ मैं आग की तफ़सील में जाना भी कारआमद रहा अब चरागों की समझ से मावरा रहता हूँ मैं मुझसे बाहर मुझको समझा जाए ये मुमकिन कहाँ एक हंगामा हूँ और ख़ुद में बपा रहता हूँ […]

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