2 Comments

T-33/15 रंजो ग़म इख्‍़त‍ियार करना था. फ़ज़ले अब्बाास ‘सैफ़ी’

रंजो ग़म इख्‍़त‍ियार करना था
हर ख़ुशी का शिकार करना था

मौत ख़ुद शानदार हो जाती
ज़ीस्त को शानदार करना था

सामने आते वो तो किस मुंह से
पुश्त पर जिनको वार करना था

मैं न कहता था लौट आऊंगा
आपको इंतिज़ार करना था

इसलिये आ गये वकालत में
झूठ का कारोबार करना था

क़ब्ल अज़ वक़्त आप बोल उठे
वक़्त का इंतिज़ार करना था

आबलों को भुलाके चलते रहे
‘हमको ये दश्त पार करना था’

राज़ अफ़्शा न होते एै ‘सैफ़ी’
ख़ुद को ही राज़दार करना था

फ़ज़ले अब्बाास ‘सैफ़ी’
09826134249

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

2 comments on “T-33/15 रंजो ग़म इख्‍़त‍ियार करना था. फ़ज़ले अब्बाास ‘सैफ़ी’

  1. ज़बान का भरपूर इस्तेमाल, धुला-मंझा हुआ लहजा। सैफ़ी साहब उम्दा ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद। ख़ास तौर से ये शेर दिल को छू गया। वाह वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    मैं न कहता था लौट आऊंगा
    आपको इंतिज़ार करना था

  2. GHAZAL PAR DHERON DAAD KABOOLEN

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: