T-28

T-28/35 बहुत रो के आये रुला कर चले-ज़ुल्फ़िकार’आदिल’

मित्रो, तरही-28 की इब्तिदा में ही क़ैद रखी थी कि एक ज़मीन में एक ही ग़ज़ल पोस्ट की जायेगी। ज़ुल्फ़िक़ार आदिल साहब पाकिस्तान के शायर हैं और हिंदी नहीं जानते। नतीजतन वो पढ़ ही नहीं सकते थे और उनके पास कोई ज़रीया ही नहीं था कि जान पाएं कि किस किस ज़मीन में काम हो […]

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T-28/34 यूं रस्मे-हिज्र हमने निभाई तमाम शब-आयुष शर्मा ‘चराग़’

हज़रते-मीर तकी ‘मीर’ की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब मुझ दिलजले को नींद न आई तमाम शब बैठे ही गुज़री वादे की शब वो नहीं फिरा ईज़ा अजब तरह की उठाई तमाम रात चश्मक चली गई थी सितारों की सुब्ह तक की आस्माँ से दीदा-बराई तमाम शब जब […]

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T-28/33 वही मुन्तज़िर मेरा उस पार होगा-नवनीत शर्मा

हज़रते-मीर तकी ‘मीर’ की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया जाे तू ही सनम हमसे बेज़ार होगा तो जीना हमें अपना दुश्‍वार होगा ——————————————- नवनीत शर्मा साहब की तरही ग़ज़ल वही मुन्तज़िर मेरा उस पार होगा कभू तो मुझे उसका दीदार होगा कहां यार होगा, कहां प्यार होगा अज़ाबों का कौन अब ख़रीदार होगा मिलेगी सज़ा […]

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T-28/32 जिस में ज़िक्रे-शबाब करता हूँ-शाहिद हसन ‘शाहिद’

हज़रते-मीर तकी ‘मीर’ की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया आम हुक्मे-शराब करता हूँ मोहतसिब को कबाब करता हूँ टुक तो रह ए बिनाये-हस्ती तू तुझ को कैसा ख़राब करता हूँ बहस करता हूँ होके अब्जद खुवां किस क़दर बे हिसाब करता हूँ कोई बुझती है ये भड़क में अबस तिश्नगी पर इताब करता हूँ सर […]

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T-28/31 जाने क़लम की आँख में किसका ज़ुहूर था-अब्दुल अहद साज़’

हज़रत मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया था मुस्तेआर हुस्न से उसके जो नूर था ख़ुर्शीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था हंगामा गर्म कुन जो दिले-नासुबूर था पैदा हर एक नाला-ए-शोरे-नशूर था पहुँचा जो आप को तो मैं पहुँचा खुदा के तईं मालूम अब हुआ कि बहुत मैं भी […]

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T-28/30 हर संग के सीने में तस्लीम गुहर भी है-असरार उल हक़ ‘असरार’

हज़रत मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया उस मंज़िले-दिलकश को मंज़िल न समझियेगा ख़ातिर में रहे यां से दरपेश सफ़र भी है —————————————————- असरार उल हक़ असरार साहब की तरही ग़ज़ल हर संग के सीने में तस्लीम गुहर भी है पर जहदे-मुसलसल को दरकार हुनर भी है ऐ शौक़े-तनआराई अंदर की ख़बर […]

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T-28/29 बारिशों में अबके याद आए बहुत-बकुल देव

हज़रत मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत दैर से सू-ए-हरम आया न टुक हम मिजाज अपना इधर लाये बहुत फूल, गुल, शम्सो-क़मर सारे ही थे पर हमें उनमें तुम्हीं भाये बहुत ‘मीर’ से पूछा जो मैं आशिक हो तुम […]

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T-28/28 ख़्वाहिशों का कोई तक़ातुल था-मनोज कुमार मित्तल ‘कैफ़’

हज़रते मीर तक़ी मीर की गज़ल जिसे तरह किया गया जब जुनूं से हमें तवस्सुल था अपनी ज़ंजीरे-पा ही का गुल था बिस्तरा था चमन में जूं बूलबूल नाला सरमाया-ए-तवक्कुल था इक निगह को वफ़ा न की गोया मौसमे-गुल सफ़ीरे-बुलबुल था उनने पहचानकर हमें मारा मुंह न करना उधर तजाहुल था शहर में जो नज़र […]

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T-28/27 इज़्तिराबी अज़ाब की सी है-नकुल गौतम

हज़रते मीर तक़ी मीर की गज़ल —– हस्ती अपनी हबाब की सी है ये नुमाइश सराब की सी है नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए पंखुड़ी इक गुलाब की सी है चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है बार-बार उस के दर पे जाता हूँ, हालत अब इज्तेराब […]

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T-28/26 तब की तब थी हुई ये अब की बात-मनोज कुमार मित्तल ‘कैफ़’

हज़रत मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया क्या कहें अपनी उसकी शब की बात कहिये होवे जो कुछ भी ढब की बात अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात नुक्तादानान रफ़्ता की न कहो बात वो है जो हावे अब की बात किसका रू-ए-सुख़न नहीं […]

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T-28/25 जो है चश्मा उसे सराब करो-बकुल देव

हज़रत मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया फ़ुरसते-बूदो-बाश यां कम हैं काम जो कुछ करो शिताब करो मह्वे-सूरत न आरसी में रहो अहले मा’ना से टुक हिजाब करो झूठ उसका निशां न दो यारो हम ख़राबों को मत ख़राब करो मुंह खुले उसके चांदनी छिटकी दोस्तो सैरे-माहताब करो मीर जी राज़े-इश्क़ होगा […]

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T-28/24 हो चुके हर शय से बेज़ारों के बीच-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच हों जो रहमत के सज़ावारों के बीच जी सदा उन अब्रुओं में है रहा की बसर हम उम्र तलवारों के बीच चश्म हो तो आइनाख़ाना है दह्र मुंह नज़र आता है दीवारों के बीच हैं अनासिर की ये सूरतबाजि़यां […]

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T28/23 नज़रें मिलीं तो दोनों पे यकसां असर किया-अभय कुमार ‘अभय’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया वो दस्ते-ख़ौफ़नाक रहा है मिरा वतन सुनकर जिसे ख़िज़र ने सफ़र से हज़र किया कुछ कम नहीं है शब्दबाज़ों से मयगुसार दारू पिला के शैख़ को आदम से ख़र किया लुक़नत तिरी ज़बान की है सेहर जिस प शोख़ इक हर्फ़े-नीमगुफ़्ता ने दिल पर असर किया […]

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T-28/22 चार ही दिन की तो जवानी है-आलोक कुमार श्रीवास्तव “शाज़” जहानी

हज़रते-मीर तक़ी “मीर” की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया अब जो इक हसरते-जवानी है उम्रे-रफ़्ता की ये निशानी है रश्के-यूसुफ़ है आह वक़्त अज़ीज़ उम्र इक बार कारवानी है ख़ाक थी मौजज़न जहाँ में, और हम को धोखा ये था कि पानी है गिरिया हर वक़्त का नहीं बे-हेच दिल में कोई ग़मे-निहानी है उसकी […]

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T-28/21 मिरा लड़ख़डाना तिरा पास आना-पूजा भाटिया

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया न सोचा न समझा न सीखा न जाना मुझे आ गया ख़ुद ब ख़ुद दिल लगाना ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना जुबां पर लगी है वफ़ाओं कि मुहरें ख़मोशी मिरी कह रही है फ़साना गुलों तक लगायी तो […]

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T-28/20 क्या कीजे इल्मो-फ़न के तलबगार मर गए-आसिफ़ अमान

हज़रते-मीर तकी मीर की ग़ज़ल, जिस ज़मीन को तरह किया गया जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गए अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गए होता नहीं है उस लबे-नौ-ख़त पे कोई सब्ज़ ईसा को खिज्र क्या सभी यक बार मर गए यूँ कानो-कान गुल ने न जाना चमन में आह सर […]

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T-28/19 बड़े सर-फिरे से निभा कर चले-अज़हर इनायती

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसकी ज़मीं को तरह किया गया फ़क़ीराना आए सदा कर चले मियां ख़ुश रहो हम दुआ कर चले जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हम सो उस अहद को अब वफ़ा कर चले वो क्या चीज़ है आह जिसके लिये हर इक चीज़ से दिल उठा कर चले […]

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T-28/18 आँखों से झाँकती हुई हैरत को क्या हुआ-सौरभ शेखर

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ज़मीन जिसमें ग़ज़ल कही गयी इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ छोड़ा वफ़ा को उन्ने मुरव्वत को क्या हुआ उम्मीदवार वादा-ए-दीदार मर चले आते ही आते यारों क़यामत को क्या हुआ कब तक तज़ल्लुम आह भला मर्ग के तईं कुछ पेश आया वाक़या रहमत को क्या हुआ उसके गये […]

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T-28/17 कल दुपट्टा छुआ था एक मिस का-गुमनाम पिथौरागढ़ी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ज़मीन जिसमें हज़ल कही गयी :- मुँह तका ही करे है जिस-तिस का हैरती है ये आइना किस का जाने क्या गुल खिलाएगी गुल-रुत ज़र्द चेह्रा है डर से नर्गिस का शाम ही से बुझा-सा रहता है दिल हो गोया चराग़ मुफ़लिस का आँख बेइख़्तियार भर आई हिज्र सीने में जब […]

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T-28/16 ज़ुल्म के सामने सर अपना झुकाया न गया-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब ‘मेरठी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया उस की दीवार का सर से मेरे साया न गया दिल के तईं आतिशे-हिज्राँ से बचाया न गया घर जला सामने पर हम से बुझाया न गया क्या तुनक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आह इक दम राज़ महब्बत का छुपाया […]

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T-28/-16 पल दो पल का जलवा है ये हर नज़्ज़ारा जाने है-पवन कुमार ‘पवन’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया […]

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T-28/15 ये किस की याद का दिल पर रफ़ू था-बकुल देव

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल सहर गह ‘अ़ीद में दौरे-सुबू था. पर अपने जाम में तुझ बिन लहू था ग़लत था आप से ग़ाफ़िल गुज़रना न समझे हम कि इस क़ाबिल में तू था चमन की वज़्अ ने हम को किया दाग़ कि हर ग़ुंचा दिले-पुर आरज़ू था गुलो-आईना क्या ख़ुर्शीदो-मह क्या जिधर देखा तिधर […]

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T-28/14 टूट कें काँच की रकाबी से – नवीन

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल:- उम्र भर हम रहे शराबी से दिल-ए-पुरख़ूँ की, इक गुलाबी से जी डूबा जाए है, सहर से, आह रात गुजरेगी किस ख़राबी से खिलना कम कम, कली ने सीखा है उसकी आँखों की नीम ख़्वाबी से बुर्क़ा उठते ही चाँद सा निकला दाग़ हूँ उसकी बे-हिजाबी से काम थे इश्क़ […]

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T-28/13 क्या हुआ मुझको जो बरबादे-जुनूँ माना गया-अभय कुमार ‘अभय’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया कुछ न देखा फिर बजुज़ इक शोला-ए-पुरपेचो-ताब शम्म तक तो हमने देखा था कि परवाना गया एक ही चश्मक बनी थी सुहबते-अहबाब की दीदा-ए-तर साथ ले मजलिस से पैमाना गया गुल खिले सदरंग तो क्या बेपरी से ऐ नसीम मुद्दतें गुज़रीं कि वो गुलज़ार का […]

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T-28/12 ”उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया”-तुफ़ैल चतुर्वेदी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया अहदे-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की […]

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T-28/11 किस तरफ़ तेरा ध्यान है प्यारे-फ़ज़ले-अब्बास सैफ़ी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया क़स्द गर इम्तहान है प्यारे अब तलक नीमजान है प्यारे सिजदः करने पे सर कटे है जहाँ वो तिरा आस्तान है प्यारे गुफ़्तगू रेख़ते में हमसे न कर ये हमारी ज़बान है प्यारे छोड़ जाते हैं दिल को तेरे पास ये हमारा निशान है प्यारे […]

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T-28/10 साया है मेरे सर पे किसी कोर बख़्त का-शफ़ीक़ रायपुरी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया सब्ज़ाने-ताज़ा-रौ की जहाँ जलवागाह थी अब देखिये तो वां नहीं साया दरख़्त का जूं बर्ग-हाय-लाला परीशान हो गया मज़कूर क्या है अब जिगरे-लख़्त लख़्त का दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताजो-तख़्त का ख़ाके-सियह से मैं जो बराबर […]

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T-28/9 पसे-मंज़र नज़र जो जाती है-शाहिद हसन ‘शाहिद’

हज़रते-मीर तकी मीर की ग़ज़ल जिसे तरही किया गया आह जिस वक़्त सर उठाती है अर्श पर बर्छियाँ चलाती है नाज़बरदार लब है जाँ जब से तेरे ख़त की ख़बर को पाती है ए शबे-हिज्र रास्त कह तुझ को बात कुछ सुब्ह की भी आती है चश्मे-बद-दूर चश्मे-तर ए ‘मीर ‘ आँखें तूफ़ान को दिखाती […]

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T-28/8 मुद्दआ ही खो गया नारों के बीच-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच हों जो रहमत के सज़ावारों के बीच जी सदा उन अब्रुओं ही में रहा की बसर हम उम्र तलवारों के बीच चश्म हो तो आइनाख़ाना है दह्र मुंह नज़र आता है दीवारों के बीच हैं अनासिर की ये […]

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T-28/7 जब यक़ीं दरमियां से उठता है-सीमा शर्मा मेरठी

हज़रते मीर तक़ी मीर साहेब की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआं सा कहाँ से उठता है गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक शोला इक सुब्ह याँ से उठता है खाना-ऐ-दिल से ज़िन्हार न जा कोई ऐसे मकाँ से उठता है नाला सर खेंचता […]

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T-28/6 गर्दिश में था तो जाम, मगर मुझ से दूर था-शाज़ जहानी

हज़रते-मीर तक़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया था मुस्तआर हुस्न से उसके जो नूर था ख़ुर्शीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़ुहूर था हंगामा गर्मकुन जो दिले-नासुबूर था पैदा हरेक नाले से शोरे-नुशूर था पहुँचा जो आप को तो मैं पहुँचा ख़ुदा के तईं मालूम अब हुआ कि बहुत मैं भी दूर था […]

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28/5 तुम्हें यदि किसी और से प्यार होगा-चन्द्रभान भारद्वाज

हज़रते-मीर तक़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा तो जीना हमें अपना दुशवार होगा ग़मे-हिज्र रखेगा बेताब दिल को हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा जो इफ़राते-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़ कोई दिन में बरसों का बीमार होगा उचटती मुलाक़ात कब तक रहेगी कभू तो तहे-दिल से भी […]

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T-28/4 याद ऐ ग़म तेरी न आनी थी-शिज्जु शकूर

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया यार बिन तल्ख़ ज़िन्दगानी थी दोस्ती मुद्दई-ए-जानी थी शेब में फ़ायदा तअम्मुल का सोचना तब था जब जवानी थी मेरे क़िस्से से सब की नींदें गई कुछ अजब तौर की कहानी थी मेरे क़िस्से से बच के निकला ख़िज्र इसी में उसकी ज़िन्दगानी थी फ़िक्र पर […]

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T-28/3 चैन इस दिल को कब नहीं आता-समर कबीर

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया अश्क आंखों में कब नहीं आता लहू आता है जब नहीं आता होश जाता नहीं रहा लेकिन जब वो आता है तब नहीं आता दिल से रुखसत हुई कोई ख़ाहिश गिरिया कुछ बेसबब नहीं आता इश्क़ का हौसला है शर्त वरना बात का किस को ढब […]

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T-28/2 अक्स कितने आसमां लाता रहा-दिनेश नायडू

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ज़मीन जिसमें ग़ज़ल कही गयी :- इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा आख़िर अब दूरी में जी जाता रहा मेह्र ओ माह गुल फूल सब थे पर हमें चेहरई चेहरा ही वो भाता रहा दिल हुआ कब इश्क़ की रह का दलील मैं तो ख़ुद गुम ही उसे पाता रहा मूँह […]

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T-28/1 जब तलक दम रहा मिरे दम में-समर कबीर

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ज़मीन जिसमें ग़ज़ल कही गयी :- जाए है जी निजात के ग़म में ऐसी जन्नत गई जहन्नम में ———————————— समर कबीर साहब की तरही ग़ज़ल जब तलक दम रहा मिरे दम में मुस्कुराता रहा हर इक ग़म में गीत अपने अलग-अलग हैं मगर हमने गाया है एक सरगम में फ़ासला कितना […]

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T-28 तरही-28 की तरही नशिस्त में इस बार हज़रते-मीर तक़ी मीर की चौखट पर हाज़िरी

रोते फिरते हैं सारी सारी रात अब यही रोज़गार है अपना मुझे आज ही मुद्दतों बाद ये शेर याद आया और मैं वाह वाह कर उठा। ये शेर हज़रते-मीर तक़ी मीर का है। आज तरह तय भी करनी है तो ऐसा करते हैं कि इस बार की क़ैद हज़रते-मीर तक़ी मीर की किसी भी ग़ज़ल […]

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