T-20

T-20-तरही महफ़िल का समापन

साहिबो तरही में इस बार शायर हज़रात ने बहुत उम्दा काम किया. कई दोस्तों ने तो ग़ज़ल कई-कई बार दुबारा कही. शुरू में कई साथियो को ज़मीन कठिन लग रही थी मगर बाद में राह आसान लगने लगी. यूँ तो सब ठीक-ठाक रहा मगर कुछ ग़लतियां भी हुईं. बहरहाल मैं बिना शायर का नाम इस्तेमाल […]

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T-20/55 आपकी याद लगातार सम्हाले हुए हैं -‘खुरशीद’ खैराड़ी

आपकी याद लगातार सम्हाले हुए हैं दश्त में ज़ीनते-बाज़ार सम्हाले हुए हैं एक मुद्दत से पलक पर नहीं लगती है पलक मेरी आँखें शबे-बेदार सम्हाले हुए हैं दर्द बख़्शे हैं हमें तूने सो करते हैं नज़्म शायरी में तिरा इज़हार सम्हाले हुए हैं यादे-पाज़ेब की ज़िंदाँ में यही सूरत है ? ”आप ज़ंजीर की झंकार […]

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T-20/54 रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं-नकुल गौतम

रुख़ हवा का भी ख़रीदार संभाले हुए हैं इश्तिहारों ने ही अख़बार संभाले हुए हैं हर तरफ़ फैल रही है जो वबा लालच की अब तबीबों ने भी बाज़ार संभाले हुए हैं कर रही है ये बयानात का सौदा खुल के ये अदालत भी गुनहगार संभाले हुए हैं आप का हुस्न तो परवाने बयां करते […]

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T-20/53 दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं-मुमताज़ नाज़ां

दर्दो-वहशत का इक अंबार संभाले हुए हैं कितने ग़म हैं, कि यूँ ही यार संभाले हुए हैं तेरी गुफ़्तार, तेरा लुत्फ़, तेरा ग़म, तेरी याद कितनी चीज़ें हैं कि बेकार संभाले हुए हैं दौरे-सरमाया में बिकते हुए नाकाम उसूल सर पे कब से ये गराँ बार संभाले हुए हैं इनमें आबाद हैं टूटे हुए कुछ […]

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T-20/52 इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं,दिनेश कुमार स्वामी “शबाब” मेरठी

इनको छूना न ख़बरदार संभाले हुए हैं अब ये दरवाज़े ही दीवार संभाले हुए हैं हाय वो आँखें, वो रुख़सार, वो सीने की उठान इक बदन में कई तलवार संभाले हुए हैं कितनी सदियों से अजंता के ये बुत देखो तो लब पे ख़ामोशी की गुफ़्तार संभाले हुए हैं ज़िंदा रहने को ज़रूरी हैं बहुत […]

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T-20/51 आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं-असलम इलाहाबादी

आज भी अज़मते-किरदार संभाले हुए हैं तेज़ आंधी में भी दस्तार संभाले हुए हैं कुछ तिरे लोग भी करते हैं तिरा ज़िक्र बहुत कुछ तिरी साख को अख़बार संभाले हुए हैं किसकी हिम्मत है इधर आँख उठा कर देखे इस इलाक़े को तो सरकार संभाले हुए हैं अहले-सरवत तो निकलते ही नहीं हैं घर से […]

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T-20/50 कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं-मनीष शुक्ल

कितनी मुश्किल से ये आज़ार संभाले हुए हैं लड़खड़ाती हुई गुफ़्तार संभाले हुए हैं अब तो आवाज़ बिखरने सी लगी है अपनी फिर भी हम क़ूवते-इज़हार संभाले हुए हैं बदहवासी में गुज़र जाते कभी के हद से आबले पांव के रफ़्तार संभाले हुए हैं ख़ुद को होने न दिया ठीक किसी भी सूरत अब तलक […]

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