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सर्दी में एक ठिठुरी हुई ग़ज़ल – गौतम राजरिशी

ठिठुरी रातें, पतला कम्बल, दीवारों की सीलन…उफ़ और दिसम्बर ज़ालिम उस पर फुफकारे है सन-सन …उफ़ दरवाजे पर दस्तक देकर बात नहीं जब बन पायी खिड़की की छोटी झिर्री से झाँके है अब सिहरन…उफ़ छत पर ठाठ से पसरा पाला शब भर खिच-खिच शोर करे सुब्ह को नीचे आए फिसल कर, गीला-गीला आँगन…उफ़ बूढ़े सूरज […]

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T-25/3 मैं एहतियाते-हुस्ने-ख़ला में लगा रहा – नवीन

मैं एहतियाते-हुस्ने-ख़ला में लगा रहा। इनसान हूँ सो कारे-वफ़ा में लगा रहा॥ ये काम करना सब से ज़ुरूरी था इसलिये। मैं लमहा-लमहा फ़िक्रे-फ़ज़ा में लगा रहा॥ ख़ामोशियों से डर के तमाम उम्र साहिबान। मैं कारोबारे-सिन्फ़े-नवा में लगा रहा॥ नवीन सी. चतुर्वेदी +919967024593

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कभी तुम्हारा था वो, नहीं था, हटाओ छोड़ो-शमीम अब्बास

कभी तुम्हारा था वो, नहीं था, हटाओ छोड़ो घिसा पिटा वाक़या कभी का हटाओ छोड़ो अगर नहीं वो नहीं सही कौन सी कमी है यही ना ये सूनापन ज़रा सा, हटाओ छोड़ो तो उस के बिन मर मिटोगे सचमुच नहीं जियोगे ये बैन आहो बुका तमाशा, हटाओ छोड़ो ठहरना, कुछ सोच कर पलटना, उसी को […]

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बस्ती के कुछ छज्जे अब भी आईने चमकाते हैं-गौतम राजरिशी

उन होठों की बात न पूछो, कैसे वो तरसाते हैं इंगलिश गाना गाते हैं और हिंदी में शरमाते हैं इस घर की खिड़की है छोटी, उस घर की ऊँची है मुँडेर पार गली के दोनों लेकिन छुप-छुप नैन लड़ाते हैं बिस्तर की सिलवट के किस्से सुनती हैं सूनी रातें तन्हा तकिये को दरवाजे आहट से […]

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एक गीला दिन टंगा था तार पर- स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

एक गीला दिन टंगा था तार पर धूप होने के न थे आसार पर धीरे धीरे सो गयी हर इक सदा रह गयी इक ख़ामुशी बेदार पर घर के बाग़ीचे की बोगनवेलिया झांकती है चढ़ के इक दीवार पर चाँद कितनी देर तक ठहरा रहा  बनके आंसू रात के रुख़सार पर  ज़ह्न पर तारी है […]

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जब तौलिये से कसमसाकर- गौतम राजरिशी

जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ उसकी खुल गयी फिर बालकोनी में हमारे झूम कर बारिश हुई करवट बदल कर सो गया था बिस्तरा फिर नींद में बस आह भरती रह गयी प्याली अकेली चाय की इक गुनगुनी-सी सुब्ह शावर में नहा कर देर तक बाहर जब आई, सुगबुगा कर धूप छत पर जग उठी उलझी […]

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T-3/14-मिरी दीवानगी पर वो हँसा तो-नवीन सी. चतुर्वेदी

मिरी दीवानगी पर वो, हँसा तो ज़रा सा ही सही लेकिन, खुला तो अजूबे होते रहते हैं जहाँ में किसी दिन आसमाँ फट ही पड़ा, तो? हवस कमज़ोर करती जा रही है ज़मीं निकली, फ़लक भी छिन गया, तो? न यूँ इतराओ नकली जेवरों पर कलई खुल जायेगी छापा पड़ा, तो उमीदों का दिया बुझने […]

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