Dwijendra Dwij

T-33/29 उसपे ख़ुद को निसार करना था. द्विजेन्द्र द्विज

उसपे ख़ुद को निसार करना था इश्क़ क्या बार-बार करना था? अपना यूँ कारोबार करना था ख़ुद को इक इश्तिहार करना था ज़ीस्त को पुर-बहार करना हश्र तक इन्तज़ार करना था ग़म अता थी तो उसमें लुत्फ़ आता यह भी परवरदिगार करना था उससे हम इल्तिजा भी क्या करते खु़द को ही शर्मसार करना था […]

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T-31/12 यह ख़यालों की चमेली, रातरानी और है. द्विजेंद्र ‘द्विज’

यह ख़यालों की चमेली, रातरानी और है दिल के सहरा में ग़मों की बाग़बानी और है सामने सबके ये रूहानी कहानी और है हाँ, पसे-पर्दा तिरी फ़ितरत पुरानी और है कोई भी खु़शियों का लश्कर छू नहीं पाता जिसे दिल में इक महफ़ूज़ ग़म की राजधानी और है आपका चेह्रा है साहब ज़ेह्नो-दिल का आइना […]

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T-26/37 बिछड़ कर वो सरे-मंज़िल गया है-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया नसीबों से कोई गर मिल गया है तो पहले उस पे अपना दिल गया है करेगा याद क्या क़ातिल को अपने तड़पता याँ से जो बिस्मिल गया है लगे हैं ज़ख़्म किस की तेग़ के ये कि जैसे फूट सीना खिल गया है ख़ुदा के वास्ते उस को […]

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T-26/32 दिल ये मेरा निहाल था, क्या था-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

हज़रते-मसहफी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया ख़्वाब था या ख़याल था क्या था हिज्र था या विसाल था क्या था मेरे पहलू में रात जा कर वो माह था या हिलाल था क्या था चमकी बिजली सी पर न समझे हम हुस्न था या जमाल था क्या था शब जो दिल दो […]

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T-26/19 मुन्तज़र ही नहीं है जब कोई-द्विजेन्द्र द्विज

हज़रते मुसहफ़ी साहब की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया कह गया कुछ तो ज़ेरे-लब कोई जान देता है बेसबब कोई जावे क़ासिद उधर तो ये कहियो राह तकता है रोज़ो-शब कोई गो कि आंखों में अपनी आवे जान मुंह दिखाता है हमको कब कोई बन गया हूं मैं सूरते-दीवार सामने आ गया है जब कोई […]

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T-21/35 तू कह रहा है तिरे सब हैं ज़ाविए रौशन-द्विजेन्द्र द्विज

तू कह रहा है तिरे सब हैं ज़ाविए रौशन `क़लम सम्भाल अँधेरे को जो लिखे रौशन’ चमक-दमक में तू बीनाई बख़्शना मौला हर एक गाम पे मिलते हैं आइने रौशन वगरना इनको अँधेरा निगल चुका होता हमारे अज़्म ने रक्खे हैं हौसले रौशन बहुत सँभाल के रखता हूँ अपने अश्कों को ये मेरी आँखों में […]

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T-20/43 ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं-द्विजेन्द्र द्विज

ये भले लोग तो दस्तार सँभाले हुए हैं सर मगर काँधों पे ख़ुद्दार सँभाले हुए हैं यह अलग बात है आज़ार सँभाले हुए हैं एक अजब नूर ये रुख़सार सँभाले हुए हैं रू-ब-रू हमसे हमेशा रहा है हर मौसम हम पहाड़ों का भी किरदार सँभाले हुए हैं यह जो आवाज़ों का जमघट है हमारे अन्दर […]

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