3 टिप्पणियाँ

T-33/14 उसको तो शर्मशार करना था. परवीन ख़ान

उसको तो शर्मशार करना था
अपने ग़म का सिंगार करना था

गर जुनूँ से भरे हुए थे आप
तब तो कुछ शानदार करना था

यार तुमने भी ख़ैर.. जाने दो
“हमको ये दश्त पार करना था”

सोच पर अपनी वार कर बैठे
सोच पर उसकी वार करना था

उसको अपनी जुबां की लज़्ज़त को
बेजुबां का शिकार करना था

मेरी रग रग से वो तो वाकिफ़ थे
कुछ अलग अबके बार करना था

हम तकल्लुफ़ में पड़ गये वरना
तुम पे सबकुछ निसार करना था

परवीन ख़ान

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3 comments on “T-33/14 उसको तो शर्मशार करना था. परवीन ख़ान

  1. बहुत ही उम्दा ।
    लाजवाब ग़ज़ल ।

  2. पूरी ग़ज़ल मुरस्सा एक एक शेर क़ारी वार, जानलेवा क़ातिल, जीती रहिये बिटिया। इसी तरह मंज़िलें मरती रहिये

    उसको तो शर्मशार करना था
    अपने ग़म का सिंगार करना था

    गर जुनूँ से भरे हुए थे आप
    तब तो कुछ शानदार करना था

    यार तुमने भी ख़ैर.. जाने दो
    “हमको ये दश्त पार करना था”

    सोच पर अपनी वार कर बैठे
    सोच पर उसकी वार करना था

    उसको अपनी जुबां की लज़्ज़त को
    बेजुबां का शिकार करना था

    मेरी रग रग से वो तो वाकिफ़ थे
    कुछ अलग अबके बार करना था

    हम तकल्लुफ़ में पड़ गये वरना
    तुम पे सबकुछ निसार करना था

  3. मेरी रग रग से वो तो वाकिफ़ थे
    कुछ अलग अबके बार करना था

    KYA KEHNE…SUBHAN ALLAH

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