2 टिप्पणियाँ

T-31/17 ये इशारे और हैं, यह मुँह-ज़ुबानी और है. गौतम राजरिशी

यह ग़ज़ल व्‍हॉट्सएप पर समय से आगयी थी।माज़रत के साथ पास्‍ट कर रहा हूं-

ये इशारे और हैं, यह मुँह-ज़ुबानी और है
दर हक़ीकत मेरी-तेरी तो कहानी और है

अश्क़, आहें, बेबसी, वहशत, ख़ुमारी…कुछ नहीं
और है, यारो ! मुहब्बत की निशानी और है

पास बैठे इक ज़रा, फिर गाल छू कर चल दिए
ये सितम कुछ और है, ये मेहरबानी और है

अपनी वुसअत पर समन्दर चाहे इतरा ले, मगर
पूछ लो साहिल से, दरिया की रवानी और है

हाँ ये माना जा चुका वो, अब ख़िजां का वक़्त है
आयेगा वो आयेगा, इक रुत सुहानी और है

नाक पर मोटा सा चश्मा, कुछ सफेदी बाल में
हाँ मगर तस्वीर अलबम में पुरानी और है

इक चमेली से महकता है तो घर सारा, मगर
रोज़ ख़्वाबों में सुलगती रातरानी और है

– गौतम राजरिशी
9759479500

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2 comments on “T-31/17 ये इशारे और हैं, यह मुँह-ज़ुबानी और है. गौतम राजरिशी

  1. आपके रंग से भरपूर..क्या कहने भैया..वाह वाह..दिली मुबारकबाद
    कान्हा

  2. Wah wah kya khoob waaah lajawab Ghazal daad Hi daad

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