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T-31/16 हक़ बयानी और है नाहक़ बयानी और है. मुनव्वर अली ताज

साहिबान, मुनव्वर अली ताज साहिब की ग़ज़ल वक्‍़त से पहुंच गई थी। मेरी चूक से ही समय पर पोस्‍ट नहीं को पाई। बसद माज़रत अब पोस्‍ट कर रहा हूं:-

हक़ बयानी और है नाहक़ बयानी और है
कह रही है कुछ जुबां लेकिन कहानी और है

जु़ल्फ खुलकर तब बिखर ती थी घटाओं की तरह
जु़ल्फ कट कर अब बिखरने की कहानी और है

देश में पहले भी होती थीं सयानी बेटियां
वो सरापा शर्म थीं अब हर सयानी और हैै

ग़म उठाने की कहानी है इसी घर की मगर
इस जु़बां से और हैै उस की जु़बानी और हैै

जान लेने पर उतारू हो गई है अब ग़ज़ल
वो दिवानी मीर की थी ये दिवानी और हैै

मुतमइन होना तुझे कामिल नहीं कर पाएगा
नज़रे अव्वल खू़ब लेकिन नज़रे सानी और है

क्यूँ भटकता फिर रहा है चाँदनी में ताज तू
रातरानी और है राहत की रानी और है

मुनव्वर अली ताज उज्जैन
09893498854

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4 comments on “T-31/16 हक़ बयानी और है नाहक़ बयानी और है. मुनव्वर अली ताज

  1. Bhut achhi gjal khe he Mubarak bad kubul frmay.

  2. Bahut umda Ghazal ata ki janab wah wah kya kahne

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