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T-31/9 खूं रगों में और है आँखों में पानी और है. अभय कुमार ‘अभय’

खूं रगों में और है आँखों में पानी और है
क्या कहें धरती प रंगे आसमानी और है।

तू मुसव्विर है मेरा और मैं तेरा शहकार हूं
तेरा सानी और है न मेरा सानी और है।

उमरे फ़ानी ही से हम ऐ वाइज़ा तंग आ गए
आप कहते हैं एक उमरे जाविदानी और है।

हो गया मफ़्लूज़ आख़िर अपनी तैराकी का फ़न
और थी कल,आज दरिया की रवानी और है

नर्मो नाज़ुक हाथ पर मेहंदी से लिक्खी थी कभी
संगरेज़ों पर मगर दिल की कहानी और है।

हो के सोना हम तो बस सर्फ़ ए कसौटी हो गए
जब भी देखा साईते जां इम्तहानी और है।

ज़िन्दगी का राग हमने गा लिया मल्हार सा
हां अभी इस ज़िन्दगी की नौहाख़्वानी और है।

जानो तन से ज़र्फ़ से हम कब से साबित हैं तो फिर
क्या कोई आइना ए हिन्दोस्तानी और है।

है बिखरने टूटने का भी अलग अपना मज़ा
रोज़ कल के वास्ते इक खुशगुमानी और है।

हाले दिल सुनकर कहा हम सब समझते हैं ‘अभय’
” कह रही है कुछ ज़ुबां लेकिन कहानी और है” ।

अभय कुमार ‘अभय’

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2 comments on “T-31/9 खूं रगों में और है आँखों में पानी और है. अभय कुमार ‘अभय’

  1. tera saani aur hai…..wahhh kya misra hai
    sarf e kasauTi …nazar e saani chaahta hai…

  2. Bahut hi bemisal Ghazal dheron daad wah wah wah wah kya kahne umda

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