14 टिप्पणियाँ

T-31/12 यह ख़यालों की चमेली, रातरानी और है. द्विजेंद्र ‘द्विज’

यह ख़यालों की चमेली, रातरानी और है
दिल के सहरा में ग़मों की बाग़बानी और है

सामने सबके ये रूहानी कहानी और है
हाँ, पसे-पर्दा तिरी फ़ितरत पुरानी और है

कोई भी खु़शियों का लश्कर छू नहीं पाता जिसे
दिल में इक महफ़ूज़ ग़म की राजधानी और है

आपका चेह्रा है साहब ज़ेह्नो-दिल का आइना
‘कह रही है कुछ ज़बाँ लेकिन कहानी और है’

रब्त और आहंग हैं गुम ज़िन्दगी के शे’र से
और है ऊला मगर मिसरा-ए-सानी और है

एक चुटकी में ही खुल जाते हैं सब के सब हिसाब
पारसाई की तिरी ये लनतरानी और है

देखता कोई नहीं माना पसे पर्दा तुझे
तेरे ऊपर एक नज़रे-आसमानी और है

हर किसी से पेश तू आती नहीं है इस तरह
ज़िन्दगी हमसे तिरी ये बदगुमानी और है

यूँ भी आँसू पोंछने वाला नहीं मिलता कोई
और रो ले जब तलक आँखों में पानी और है

आइनों से मत उलझना झूट वो कहते नहीं
रोग यह उनका पुराना ख़ानदानी और है

ढूँढते हैं जिस्म पर मेरे वो ज़ख़्मों के निशाँ
भूलते क्यों हैं कि यह मर्ज़े -निहानी और है

तू बहा जितने बहाने हैं सियासत ये तुझे
हाँ तिरे इन आंसुओं की तर्जुमानी और है

और कुछ ख़ामी नहीं है ’द्विज’ तेरे अल्फ़ाज़ में
बस, ये लोहा ढालने की ज़िद पुरानी और है

आपको लाये हैं मुझ तक जिसके क़दमों के निशाँ
हूँ मैं कोई और, ’द्विज’ वो आँजहानी और है

द्विजेंद्र द्विज 09418465008

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14 comments on “T-31/12 यह ख़यालों की चमेली, रातरानी और है. द्विजेंद्र ‘द्विज’

  1. आदरणीय भाई डॉ आज़म साहिब

    ग़ज़ल पसंद करने के लिए और ग़लतियां बताने के लिए तहेदिल से शुक्रिया|

    नज़रे आसमानी
    वाला मिसरा
    यूं पढ़ें:
    *तेरे ऊपर एक चश्मे-आसमानी और है*

    मरज़े-निहानी
    वाले मिसरे को यूं पढ़ें:

    *भूलते क्यों हैं ये आजारे-निहानी और है*

    मिसरा -ए-सानी वाले मिसरे में क्या करूं , समझ नहीं आ रहा|

    शुक्रिया!

  2. BAHUT KHOOB
    TAWEEL MAGAR JAANDAAR GHAZAL…
    …..
    MISRAA E SAANI
    NAZR E AASMAANI
    MARZ E NIHAANI
    ki tarkeebeN nazar e saani (NAZR E SAANI nahiN) CHAAHTI HAIn BHAI

  3. नायब ग़ज़ल के बेहतरीन शेर –

    कोई भी खु़शियों का लश्कर छू नहीं पाता जिसे
    दिल में इक महफ़ूज़ ग़म की राजधानी और है

    आइनों से मत उलझना झूट वो कहते नहीं
    रोग यह उनका पुराना ख़ानदानी और है

    ढूँढते हैं जिस्म पर मेरे वो ज़ख़्मों के निशाँ
    भूलते क्यों हैं कि यह मर्ज़े -निहानी और है

    बहुत बहुत शुभकामनाएँ

  4. क्या कहने ..बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है भैया 💐💐..

    कोई भी खु़शियों का लश्कर छू नहीं पाता जिसे
    दिल में इक महफ़ूज़ ग़म की राजधानी और है

    रब्त और आहंग हैं गुम ज़िन्दगी के शे’र से
    और है ऊला मगर मिसरा-ए-सानी और है

    वाह , गिरह भी खूब लगायी है..दिली मुबारकबाद
    कान्हा

  5. Lajawab Ghazal bakamal ashaar se saji bahut umda wah wah wah kya kahne dheron daad

  6. बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई sir
    क़माल की ग़ज़ल

    हर शेर धारदार है
    बहुत खूबसूरत मतअला

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