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T-31/8 कर मदद या रब कि मैंने दिल में ठानी और है. शाहिद हसन ‘शाहिद’

कर मदद या रब कि मैंने दिल में ठानी और है
जान अपनी मौत से मुझको बचानी और है

चाहता था मैं रहे मुझ से न बदज़न वो, मगर
बात मैंने कुछ कही और उस ने जानी और है

ला मुझे फ़ेहरिस्त देदे करने हैं जो मुझको काम
दो घड़ी की तुझको मुहलत ज़िन्दगानी और है

ऐशो-इशरत के सभी सामाँ मयस्सर हैं हमें
चैन जैसी चीज़ लेकिन दिल को पानी और है

बात मीठी कर रहा है आजकल मेरा रक़ीब
दुश्मनी शायद उसे मुझ से निभानी और है

ऐन मुमकिन है कि मिल जाये कोई मज़मूं नया
इक पतंग मुझको तख़य्युल की उड़ानी और है

अब मुसीबत है तो आता है ख़ुदा शिद्दत से याद
ऐश में गुज़रे हुए कल की कहानी और है

मौत भी राहों से मेरी बच के जाती है निकल
इस जहाँ में मेरा शायद दानापानी और है

वो मेरी पुरसिश को आएंगे मुझे मालूम है
मेरी क़िस्मत में अभी इक रुत सुहानी और है

दर्द भी हो सकता है ख़ुद दर्द की तेरे दवा
दर्द सहने की तुझे ताक़त बढ़ानी और है

ज़ुल्म मासूमों पे ढाकर भी नहीं हैं मुत्मइन
लगता है जौरो-जफ़ा पर आब आनी और है

कुछ नहीं ‘शाहिद’ फ़क़त है बदगुमानी का सबब
है मेरी पहचान कुछ तेरी निशानी और है

शाहिद हसन ‘शाहिद’
मो.09759698300

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3 comments on “T-31/8 कर मदद या रब कि मैंने दिल में ठानी और है. शाहिद हसन ‘शाहिद’

  1. umda ghazal
    achchhe sher
    wahhh

  2. Shid saheb bahut umda Ghazal hui hai lajawab bahut badhai daad qubool Karen waaaaaaah waaah

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