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T-31/3 वो तेरा इन्कार जिसकी तर्जुमानी और है-नाज़िम नक़वी

वो तेरा इन्कार जिसकी तर्जुमानी और है
कुछ नहीं तो इस तरह कहते हो यानी और है

घर के अंदर ही नहीं है एक जैसी सबकी राय
ज़ह्न का क़िस्सा अलग, दिल की कहानी और है

आँख ने नम होके किस-किस की बढ़ा दी तिश्नगी
एक समंदर पूछने आया कि पानी और है

साँस का इक खेल है तेरा बिछड़ना या मिलन
इस तमाशे तक ये दुनिया आज़मानी और है

हैं बला के रंग ‘नाज़िम’ इश्क़ के इज़हार में
मीर का लहजा जुदा, मीरा की बानी और है

नाज़िम नक़वी 9811400468

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5 comments on “T-31/3 वो तेरा इन्कार जिसकी तर्जुमानी और है-नाज़िम नक़वी

  1. UMDA
    IK SAMUNDAR…WAHHHH
    YAANI KA QAAFIYA …GHAUR TALAB HAI
    MAQTA LA JAWAAB

  2. Kya kahne bahut khoob waaah waaah umda Ghazal

  3. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए दाद क़ुबूल फरमाएं ।
    मक़्ता तो ज़बानज़द रहेगा।

  4. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए दाद क़ुबूल फरमाएं
    । मकता तो ज़बानज़द रहेगा।

  5. हैं बला के रंग ‘नाज़िम’ इश्क़ के इज़हार में
    मीर का लहजा जुदा, मीरा की बानी और है

    वाह जनाब नाज़िम साहब बहुत बहुत बधाई इस लाजवाब गज़ल के लिये

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