8 टिप्पणियाँ

T-31/2 दर्दो-ग़म भी हैं, बला-ए-आसमानी और है-नवनीत शर्मा

दर्दो-ग़म भी हैं, बला-ए-आसमानी और है
हों तो हों होते रहें, हमने भी ठानी और है

दर्द! हँसना फ़र्ज़ होता है बिछुड़ते वक़्त क्या ?
‘कह रही है कुछ ज़बां लेकिन कहानी और है’

रात-दिन की तल्ख़ियों से मिट नहीं पाया मियाँ
रंग मेरी पुतलियों में आसमानी और है

काटते आए हैं लम्‍हे नर्म आरी की तरह
फिर भी हम ये सोचते थे ज़िंदगानी और है

तेरे इक-इक तीर को सह तो लिया है जाने-जां
और भी कह ले कि जो शोला-बयानी और है

धुंध है हर सिम्‍त फैली दूर तक, तो क्‍या हुआ
इस इबारत की यहां अब तर्जुमानी और है

हर तमन्ना को किया पामाल, फिर दिल ने कहा
इक, हुजूमे-ख़ाब सरकारे-जहानी और है

वैसे तो रखता हूँ मैं आँखों को हर पल ख़ुश्क पर
याद तू आए तो इन आंखों में पानी और है

हाल की क्या बात मुस्तक़बिल तलक उसको दिया
शहर में तुम ही कहो ऐसा भी दानी और है ?

गलने-कटने से बहुत है दूर, जलने से परे
याद है ऐसी तेरी, दुनिया-ए-फ़ानी और है

इश्क़ से मारे हुए दोनों मगर ये वाक़या
मेरे देखे और है, उसकी ज़बानी और है

रंगो-ख़ुशबू ले गया जो छीन कर ‘नवनीत’ जी
मुझमें अब भी उसकी ख़ुशबू ज़ाफ़रानी और है

नवनीत शर्मा 09418040160

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8 comments on “T-31/2 दर्दो-ग़म भी हैं, बला-ए-आसमानी और है-नवनीत शर्मा

  1. बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है भैया..क्या कहने ..दाद क़ुबूल फरमाएं
    कान्हा

  2. Umda Ghazal dheron daad lajawab ashaar se saji

  3. बेहतरीन मुरस्सा ग़ज़ल हुई है जनाब नवनीत शर्मा साहब बहुत बहुत बधाई

  4. Bharpoor Gazal hui hai bhaiya
    Kuchh ash’aar to bepanaah khoobsoorat hain aur
    Girah bhi shaandaar hai !!

    Dili mubarakbad

    Regards
    Alok

  5. waah bahut khoob gazal kahi hai waah badhai …………………….

  6. दर्दो-ग़म भी हैं, बला-ए-आसमानी और है
    हों तो हों होते रहें, हमने भी ठानी और है

    दर्द! हँसना फ़र्ज़ होता है बिछुड़ते वक़्त क्या ?
    ‘कह रही है कुछ ज़बां लेकिन कहानी और है’

    रात-दिन की तल्ख़ियों से मिट नहीं पाया मियाँ
    रंग मेरी पुतलियों में आसमानी और है

    काटते आए हैं लम्‍हे नर्म आरी की तरह
    फिर भी हम ये सोचते थे ज़िंदगानी और है

    तेरे इक-इक तीर को सह तो लिया है जाने-जां
    और भी कह ले कि जो शोला-बयानी और है

    धुंध है हर सिम्‍त फैली दूर तक, तो क्‍या हुआ
    इस इबारत की यहां अब तर्जुमानी और है

    हर तमन्ना को किया पामाल, फिर दिल ने कहा
    इक, हुजूमे-ख़ाब सरकारे-जहानी और है

    वैसे तो रखता हूँ मैं आँखों को हर पल ख़ुश्क पर
    याद तू आए तो इन आंखों में पानी और है

    हाल की क्या बात मुस्तक़बिल तलक उसको दिया
    शहर में तुम ही कहो ऐसा भी दानी और है ?

    गलने-कटने से बहुत है दूर, जलने से परे
    याद है ऐसी तेरी, दुनिया-ए-फ़ानी और है

    इश्क़ से मारे हुए दोनों मगर ये वाक़या
    मेरे देखे और है, उसकी ज़बानी और है

    रंगो-ख़ुशबू ले गया जो छीन कर ‘नवनीत’ जी
    मुझमें अब भी उसकी ख़ुशबू ज़ाफ़रानी और है

    सुंदर ग़ज़ल के लिए ढेरोँ दाद!

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