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T-31/1 दिल के जज़्बों से घिरी इक रुत पुरानी और है. मोनी गोपाल ‘तपिश ‘

दिल के जज़्बों से घिरी इक रुत पुरानी और है
उसकी बाक़ी हम पे अब तक इक निशानी और है

आपसे मिलना है इक दिन,याद है सच मानिए
ऐसे जुमलों की मियां कुछ तर्जुमानी और है

बज़्म में आए हैं हम होठों पे रखकर क़हक़हे
जो छुपाकर लाए हैं आँखों में पानी और है

ख़ुशबुओं का कितने ही फूलों से रिश्ता है मगर
मेरे एहसासात में महकी जवानी और है

ग़मकदे से जब चले थे दिल में इक फ़रियाद थी
अब तेरे आकर मुक़ाबिल जी में ठानी और है

दिल में उसके भी महकते हैं मेरी चाहत के फूल
सिर्फ़ कहने को ही पैग़ाम ए ज़ुबानी और है

आप के जौर ओ सितम से आ बनी है जान पर
कह रही है कुछ ज़ुबाँ लेकिन कहानी और है

शेर कितने ही सुने हैं हमने लोगों से ‘तपिश’
आपके अशआर में लेकिन रवानी और है

मोनी गोपाल ‘तपिश’
075030 70900

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13 comments on “T-31/1 दिल के जज़्बों से घिरी इक रुत पुरानी और है. मोनी गोपाल ‘तपिश ‘

  1. achchhi ghazal hai…wahhhh

  2. अच्छी ग़ज़ल है जनाब तापिश साहब बहुत बहुत बधाई

  3. Bahot khoob tapish saab
    Kya hi khoob maqta h
    Wah wah
    F A Saify Raipur

  4. बधाई हो तपिश जी
    बहुत खूब ग़ज़ल हुई है।

  5. भाई मोनी गोपाल तपिश साहब
    खूबसोरत ग़ज़ल के लिए तहे दिल से दाद हाज़िर है|

  6. बज़्म में आए हैं हम होठों पे रखकर क़हक़हे
    जो छुपाकर लाए हैं आँखों में पानी और है

    वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई है ……………..

  7. Bahut pyari gazal hui tapish sahab
    Dili daad qubul kijiye

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