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T-30/18 तेरे दर तक जो हमारी ये रसाई हुई है. अभय कुमार

तेरे दर तक जो हमारी ये रसाई हुई है
ओज पर लगता है तक़दीर भी आई हुई है

तेरी यादों की जो बस्ती सी बसाई हुई है
हमने तन्हाई बहुत अपनी सजाई हुई है

है ग़म-ए-जां ये विरासत तो विरासत ही सही
ग़म-ए-जानां की ये दौलत तो कमाई हुई है

रोज़-ओ-शब दर्द की होती है जहां पर बरसात
वादी-ए-जां ये तुम्हारी ही दिखाई हुई है

चांद ही चांद चमकते हैं फ़लक पर हर सू
चांदनी राह में कुछ ऐसी समाई हुई है

हाल-ए-दिल उनको सुनाया तो बसद नाज़ कहा
बारहा दास्तांं तुमने ये सुनाई हुई है

ग़ालिब-ए-ख़स्ता से ताउम्र बनी या न बनी
ख़ैर से बात मगर हमने बनाई हुई है

आंख में दश्त का मंज़र भी ‘अभय’ भर लेते
ख़ाक सहरा की बहुत तुमने उड़ाई हुई है

अभय कुमार
08171611298

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One comment on “T-30/18 तेरे दर तक जो हमारी ये रसाई हुई है. अभय कुमार

  1. खूबसूरत मकता सहित पुरी ग़ज़ल शानदार वाह अभय साहेब

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