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T-30/10 जिसने महफिल मेरी साँसों की सजाई हुई है. मुनव्वर अली ताज

जिसने महफिल मेरी साँसों की सजाई हुई है
इक ग़ज़ल ऐसी मिरी जां में समाई हुई है

फ़न की इस तरह समाअत में रसाई हुई है
जिसकी तासीर ने इक धूम मचाई हुई है

होने देगी न सवेरे को अंधेरे से रिहा
तेरी ज़ुल्फों की क़सम रात ने खाई हुई है

हम रखेगें तेरी गजलों को हमेशा जिंदा
कागजों ने यूँ मिरी आस बंधाई हुई है

ढलती रहती है वो अल्फ़ाज़ के पैमानों में
उसकी चाहत मेरे अफ़कार पे छाई हुई है

खुशमिज़ाजी का नहीं चेहरे से कोई रिश्‍ता
ऐसा लगता है ग़ज़ल रूठ के आई हुई है

मैं करूंगी तेरी ग़ज़लों को नुमायां अय ‘ताज’
नेट ने भी मेरी तनवीर बढाई हुई है

मुनव्वर अली ‘ताज’
08234918812

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3 comments on “T-30/10 जिसने महफिल मेरी साँसों की सजाई हुई है. मुनव्वर अली ताज

  1. मुनव्वर अली ‘ताज’-साहब !! पूरी गज़ल ही शाइरी –शाइरी के ज़ाविये –शाइरी का मेयार और शायर के इन दायरों के अहसासात के ग़िर्द कही गई है !! एक शायर का निजत्व इस ग़ज़ल मे बेहद खूब्सूरती से नुमाया हुआ है !!! ग़ज़ल के विभिन्न अर्थ भी इस गज़ल में मिलते हैं जैसे मतले में ग़ज़ल का अर्थ मुहब्बत है – दूसरे शेर मे सामईन पर ग़ज़ल का प्रभाव – तीसरे शेर का सानी मिसरा –तेरी ज़ुल्फों की क़सम रात ने खाई हुई है—क्या खूब है !!! दस्तावेज़ का साहित्य मे महत्व और आशिकी और जुदाई के शेद्स !! और दौरे हाज़िर की पहचान इण्टरनेट सब कुछ “ताज” की गज़ल मे आ गया है !! बधाई – मयंक

  2. वाह वाहःहः क्या कहने मुनव्वर साहेब लाजवाब अंदाज़
    होने न देगी अँधेरे स सवेरे को रिहा
    तेरी जुल्फों की कसम रात ने खाई हुई हैं
    वाह प्यारा शेर।

  3. Khoosoorat Ghazal umda ashaar WAH WAH WAH KYA KAHNA daad Hi daad

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