15 टिप्पणियाँ

T-30/3 महफिले हुस्न में अपनी तो बन आई हुई है-मोनी गोपाल ‘तपिश ‘

महफिले हुस्न में अपनी तो बन आई हुई है
उसके होटों पे अचानक हंसी छाई हुई है

सारी दुनियां में हैं चर्चे मेरी रुस्वाई के अब
उसकी तस्वीर जो सीने से लगाई हुई है

गर्दिशें जाम की कुछ और बढ़ा दे साक़ी
बात पीने की न पीने की उठाई हुई है

गर मिलेगा तो करूँगा मैं शिकायत उससे
आग सीने में तेरे ग़म की समाई हुई है

कितने अरमान सजाए थे तुझे मिलने के
आज एक आस मेरे दिल की पराई हुई है

तुझसे मिलने का वो छोटा सा हसीं एक लम्हाै
ये शब ए ग़म भी उसी कोख की जाई हुई है

वो कभी प्यार से देखेगा मेरी जानिब भी
इस तमन्ना से ‘तपिश ‘मेरी सगाई हुई है

मोनी गोपाल ‘तपिश’
07503070900

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15 comments on “T-30/3 महफिले हुस्न में अपनी तो बन आई हुई है-मोनी गोपाल ‘तपिश ‘

  1. वाह बहुत खूब मोनी गोपाल साहेब बधाई कबूल करें

  2. आदरणीय तपिश जी बेहतरीन मुरस्सा ग़ज़ल है बहुत बहुत बधाई आपको

  3. मुहब्बत तो ख़ैर दुनिया की बुनियाद ही है मुश्ते ख़ाक़ को इंसान और क्या शय बनाती है !! मुहब्बत ही न !! और इसका सबसे परिपक़्व रूप है ग़म की इंतेहा !! मोनी गोपाल तपिश साहब !! मुझे इस ग़ज़ल में मुहब्बत का एक पूरा स्पेक्ट्रम मिला है –
    महफिले हुस्न में अपनी तो बन आई हुई है
    उसके होटों पे अचानक हंसी छाई हुई है
    इब्तिदा ए इश्क़ –अरूज़ ए आर्ज़ू
    सारी दुनियां में हैं चर्चे मेरी रुस्वाई के अब
    उसकी तस्वीर जो सीने से लगाई हुई है
    इम्कान ए ग़म
    गर्दिशें जाम की कुछ और बढ़ा दे साक़ी
    बात पीने की न पीने की उठाई हुई है
    रहगुज़ार ए मयख़ाना
    गर मिलेगा तो करूँगा मैं शिकायत उससे
    आग सीने में तेरे ग़म की समाई हुई है
    शिकवा
    कितने अरमान सजाए थे तुझे मिलने के
    आज एक आस मेरे दिल की पराई हुई है
    जुदाई
    तुझसे मिलने का वो छोटा सा हसीं एक लम्हाै
    ये शब ए ग़म भी उसी कोख की जाई हुई है
    हिज्रत
    वो कभी प्यार से देखेगा मेरी जानिब भी
    इस तमन्ना से ‘तपिश ‘मेरी सगाई हुई है
    तपिश
    एक शेर याद आया — आशिकी प्यार वफा दर्द जुदाई सहरा
    कितने रंगों में मुहब्बत की लडी रहती है

    शायरों में भी मेयार वाले बहुत हैं लेकिन मुहब्बत के मुसाफिर कम हैं –मोनी साहब !!आपकी मुहबत को दाद दाद दाद –मयंक

    • फ़र्श से अर्श पे ले जाना किसे कहते हैं मयंक जी कोई आपसे सीखे
      आप की दाद समीक्छा का दिल से शुक्रगुज़ार हूँ
      मैं कहूंगा ज़र्रानवाज़ी
      बहुत मेहरबानी
      तपिश

  4. बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल, बेहद बधाई।

  5. Tufail Chturvedi sahab apki pazirai zarranawazi ka dil se bahut shukriya meharbani

  6. एक मद्धम मीठा लहजा ‘तपिश’ साहब की ग़ज़ल की अमानत होता है। लफ़्ज़ की हर तरही में उनकी ग़ज़ल इसी चाशनी के साथ आती है। वही कमल इस मर्तबा भी है। मुहतरम दाद क़ुबूल फ़रमाइये।

  7. जनाब मोनी गोपाल ‘तपिश’ साहिब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

    –समर कबीर

  8. Link mein” TAPISH”ki jageh( tabish) chap gaya hai

  9. Is Ghazal K 2 Sher publish hone se rah gaye Maine request bheji hai ise edit karne ki umeed hai jald hi he dono Sher bhi isme SHAMIL kar liye jayenge–
    कितने अरमान सजाए थे तुझे मिलने के कल 
    आज एक आस मेरे दिल की  पराई  हुई   है 

    तुझसे मिलने का वो छोटा सा हसीं  एक लम्हा 
    ये शब ए ग़म भी उसी कोख की जाई हुई  है 
    Moni gopal ‘Tapish’

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