1 टिप्पणी

कुशादा रस्तों खुले जहानों से आ रहा हूँ-क़मर रज़ा शहज़ाद

कुशादा रस्तों खुले जहानों से आ रहा हूँ
मैं ख़ाक की सिम्त आसमानों से आ रहा हूँ

अभी तो आग़ाज़े-जंग है और तुम्हें ख़बर क्या
मैं फ़त्ह की सिम्त किन बहानों से आ रहा हूँ

जो आग और आफ़ताब को जानते नहीं हैं
मैं ऐसे तारीकतर मकानों से आ रहा हूँ

मैं जानता हूँ मिरा हदफ़ कौन है यहाँ पर
मुझे ख़बर है कि किन कमानों से आ रहा हूँ

बदलता जाता हूँ रास्ता और लिबास ‘शहज़ाद’
मैं एक ज़माना कई ज़मानों से आ रहा हूँ

क़मर रज़ा शहज़ाद

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One comment on “कुशादा रस्तों खुले जहानों से आ रहा हूँ-क़मर रज़ा शहज़ाद

  1. मैं एक ज़माना कई ज़मानों से आ रहा हूँ….waah waah..kya kahne
    Mubarakbaad
    Sadar
    Pooja

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