8 टिप्पणियाँ

शब् सी होती है हर सहर मुझमें-पूजा भाटिया

शब् सी होती है हर सहर मुझमें
बस उजाले की है कसर मुझमें

रोज़ उगता है इक क़मर मुझमें
चांदनी करती है सफ़र मुझमें

जैसे रहती हूँ अपने घर में मैं
वैसे रहता नहीं ये घर मुझमें

बस इसी ख़ौफ़ में मैं रहती हूं
हो न जाऊं मैं दर-ब-दर मुझमें

आइना है और अक्से-वीरां है
दश्त बसता है किस कदर मुझमें

मेरी तन्हाई का ये हासिल है
रह गया बस मेरा ही डर मुझमें

ख़ाब मुझको जगाये रखते हैं
शोर करते हैं रात भर मुझमें

डरती हूँ ये ख़ला ये ख़ामोशी
कर न जाए कहीं ये घर मुझमें

इन दिनों  मेरा आने वाला कल
कर रहा है गुज़र बसर मुझमें

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8 comments on “शब् सी होती है हर सहर मुझमें-पूजा भाटिया

  1. पूरी ग़ज़ल अच्छी है मगर ये तीन शेर क़यामत के हैं। ढेर सारी दाद

    ख़ाब मुझको जगाये रखते हैं
    शोर करते हैं रात भर मुझमें

    डरती हूँ ये ख़ला ये ख़ामोशी
    कर न जाए कहीं ये घर मुझमें

    इन दिनों मेरा आने वाला कल
    कर रहा है गुज़र बसर मुझमें

  2. वाः ह खूब पूजा जी

  3. डरती हूँ ये ख़ला ये ख़ामोशी
    कर न जाए कहीं ये घर मुझमें

    इन दिनों मेरा आने वाला कल
    कर रहा है गुज़र बसर मुझमें
    Wahhhhhhh
    Lajawab gazal hui Pooja ji
    Dili daad qubul kijiye

  4. आइना है और अक्से-वीरां है
    दश्त बसता है किस कदर मुझमें

    मेरी तन्हाई का ये हासिल है
    रह गया बस मेरा ही डर मुझमें

    Subhan Allah…Jiyo

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