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वो मेरे ख़यालों से परे जा नहीं सकता-इरशाद ख़ान सिकंदर

वो मेरे ख़यालों से परे जा नहीं सकता
ये बात मगर उसको मैं समझा नहीं सकता


यूँ बैठा तिरी बाट निहारूँ भला कब तक
मैं काम पे निकलूँ तू अगर आ नहीं सकता


वो मेरी कमी है तो कमी है मुझे तस्लीम
सच्चाई तो हर बार मैं झुटला नहीं सकता


तू मेरी ही आवाज़ में अच्छा लगा मुझको
तुझको मैं किसी और से पढ़वा नहीं सकता


सबके नहीं होते हैं सदा एक से हालात
हर शख़्स को हर वक़्त मैं चौंका नहीं सकता


माना कि मिले उससे ज़माना हुआ लेकिन
ऐसा भी नहीं है कि मैं आ-जा नहीं सकता


तुझसे भी ज़ियादा मिरे सीने में कसक है
मजबूर कुछ ऐसा हूँ कि झुंझला नहीं सकता


तू ख़्वाब मिरा और मिरा ख़्वाब भी ऐसा
मैं देख तो सकता हूँ तुझे पा नहीं सकता

 

इरशाद ख़ान सिकंद               09818354784

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About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

2 comments on “वो मेरे ख़यालों से परे जा नहीं सकता-इरशाद ख़ान सिकंदर

  1. इरशाद आपके यहाँ एक मीठी नग़मगी का शफ़्फ़ाफ़ चश्मा हर ग़ज़ल में रवां रहता है। ग़ज़ले-मरबूत की सी कैफ़ियत मिलती है। ये बड़ी रियाज़त का मुक़ाम है और यही लहजा आपके शागिर्दों में नज़र आने लगा है। मुबारक हो

  2. Lajawab gazal hui dada
    Dili daad qubul kijiye
    Regards
    Imran

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