10 Comments

1 ग़ज़ल –मयंक अवस्थी

आशना हो न सके प्यार के आखर* हमसे
इल्म की आखिरी मंज़िल न हुई सर हमसे

हम तो साहिल हैं कहीं चल के नहीं जाते हैं
दौड कर खुद ही लिपटते हैं समन्दर हमसे

आप अश्कों की ज़ुबाँ कुछ तो समझते होंगे
पूछता है बडी हसरत से सुखनवर हमसे

दर्द जब दिल का लगाये हैं हमीं सीने से
अल्विदा फिर वो कहेगा भला क्योंकर हमसे

हर समरदार शजर खुद ही झुका है इतना
हम तो चाहें भी तो उठता नहीं पत्थर हमसे

हम भी ठोकर का सिला देने लगे ठोकर से
अब तो रखते हैं सनम खुद को बचाकर हमसे

ये हैं जज़बात के टुकडे, ये तुम्हारा ख़ंजर
आओ ले जाओ मियाँ अपनी धरोहर हमसे

मुँह चिढाती है हमें हाय हमारी किस्मत
मुँह चुराता है हमारा ही मुकद्दर हमसे

हम तो अब डूबती कश्ती के मुसाफिर हैं “मयंक”
जो भी कहना हो वो कह लीजिये जीभर हमसे

मयंक अवस्थी (8765213905)
आखर – अक्षर

Advertisements

10 comments on “1 ग़ज़ल –मयंक अवस्थी

  1. Lajawab ashaar se saji shaandaar Ghazal dheron daad wah wah wah kya kahne mayankji SALAMAT RAHIYE

  2. मयंक भैया बहुत अच्छी ग़ज़ल है। आदरणीय दादा की तारीफ़ के बाद मेरे कहने को कुछ भी शेष नहीं रहता। आप कई मर्तबा मुझे गिरही ग़ज़ल कहने को कह चुके हैं। इजाज़त हो तो इस बार कोशिश कर के देखूँ।

  3. प्यारे क्या ही उम्दा ग़ज़ल है। क्या बला का मत्ला कहा है। हर शेर हीरा, हर शेर मोती। अलविदाअ पे मेरा निजी तौर पर एतराज़ होता बल्कि अगर मेरी ग़ज़ल होती तो हज़रते-नूर ऐतराज़ करते मगर हम ऐन की बेतुकी पालकी कब तक और क्यों ढोयें। जिस आवाज़ को हम बोलते नहीं उसका बोझ क्यों झेलें ? ख़ासे अल्फ़ाज़ इसी कारण नज़्म नहीं किये जा सकते। हज़रते-मीर अगर सिरहाने को सिराने न करते तो इसे कैसे नज़्म किया जाता ? ज़ाफ़रान को इस उसूल के तहत कैसे नज़्म किया जाये ? मयंक ज़िंदाबाद। इसी तरह से ज़बान की राह आसान और बेहतर करते जाइये। शेर/ग़ज़ल दमदार होगी तो किसकी मजाल है जो बकचो..करे। जीते रहिये। बने रहिये।

    • Dada !! Pranam aur abhaar !! Alwidaah ko alwida jaanboojha kur bandha hai !! hum iska ahad pahale hi kur chuke hain ki vyavharik bhasha ke nikat jaayeinge !! Shikeb ke sher –WO ALVIDAAH KA MANZAR WO BHEEGATI PALKEIN /PASE GUBHAAR BHI KYA KYA DIKHAI DETA HAI -20 BARAS SE PANE SANGYAAN ME HAI -Lekin hum saheeh ko sahi kahane lage hain naddi ko nadi aur dukkkaan ko dukan tasleem kur chuke hain aur ek bahas me pahale hi aapane kaha tha ki Lufz ki muhim kitabi bhasha aur vyavaharik bhasha ke liye setu ka kaary karegi — BAHUT BAHUT AABHAAR -MAYANK

  4. Kya kahne bhaiya kya kahne
    Sabhi ash-aar purasar
    Bharpoor gazal hui hai
    Wash wash

    Regards
    Alok

    • Sorry for mistyping

      Waah waah**

      Regards
      Alok

      • alok bhai !! Jeete rahiye aur shad o aabaad rahiye !! Ye ghazal 2-3 sher roz kah kur pichhale 3-4 dino me kahi hai –ab koshish karoonga ki agar koi bayan hai to apane group me ise publish kiya jaay koi kami hogi to hum use edit kur sakate hain — bahut bahut aabhaar !! –mayank

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: