5 टिप्पणियाँ

दो ग़ज़लें –मयंक अवस्थी

कच्ची ज़मीनों की ये दोनो ग़ज़लें सन 1998 की हैं , तब मैने एक संयुक्त संकलन “तस्वीरें पानी पर” ( केसरी प्रिंटर्स , किदवई नगर ,कानपुर) से प्रकाशित करवाया था, उससे ली गई हैं।

ग़ज़ल -1
दो सदा तो दर खुले ऐसा मकाँ कोई नहीं
इस मज़ारों के नगर में हमज़ुबाँ कोई नहीं

राब्तों की आँख में खामोशियों की बर्फ़ है
आबशारों को यहाँ करता रवाँ कोई नहीं

हर कली सहमी हुई , हर फूल मुर्झाया हुआ
गुल्शने हिन्दोस्ताँ में बागबाँ कोई नहीं

ख़ामुशी कुछ तो बयाँ करती थी अगले वक़्त की
ख़ामुशी का दौरे वहशत में बयाँ कोई नहीं

अब तो हर क़त्बे पे है इक हादसे की दास्ताँ
अब तो कब्रिस्तान में भी बेज़ुबाँ कोई नहीं

ढूँढता हूँ उस मुसव्विर को कि जिसका नक़्श हूँ
उस मुसव्विर का मगर नामो –निशाँ कोई नहीं

अब तुम्हारी फ़िक्र मयख़ानों में बिकती है “मयंक”
हम समझते थे तुम्हारा क़द्रदाँ कोई नहीं

ग़ज़ल -2
आज पानी ही नहीं है , तो ये मंज़र देखो
रेत पर मेरी तरह तुम भी समन्दर देखो

ज़ुल्म तुमसे भी सिवा हमपे हुये दुनिया में
मेरे ईसा! कभी सूली से उतरकर देखो

शेख़ !! दामन में मेरे दाग़ हैं ,माना मैने
अब ज़रा अपने ग़िरेबान के अन्दर देखो

हाथ फैलाये है ग़ैरत के क़फ़न से बाहर
आज किस हाल पहुंचा है सिकन्दर देखो

कैसे होती है ग़ज़ल तुमको समझना है अगर
तुम भी अहसास की दोज़ख़ से गुज़रकर देखो

आइना दे के गया है वो मुझे तोहफे में
किस क़दर है मेरा महबूब सितमगर देखो

मयंक अवस्थी ( 8765213905)

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5 comments on “दो ग़ज़लें –मयंक अवस्थी

  1. मयंक जी आपकी यह ग़ज़ल बेहद सुन्दर है……आपकी दूसरी ग़ज़ल में पानी के विषय में है जो कि बहुत बेहतर है…….ऐसी ही ग़ज़ल टूट जाता हूँ फिर भी बिखरता नही भी पढ़िए…….

  2. Lajawab ashaar se saji shaandaar Ghazalen bahut umda dheron daad
    Tapish

    • Moni Gopal “Tapish”Sahab !! Bahut bahut shukriya !! Ye Ghazal par meri pahali koshishein hain ! tab in ghazalon ke bahut sare sher bahar me nahin te jinki bahut criticism bhi hui thi – criticism ke bad inhein 4-6 months ke baad fir durust kiya tab ye shape ai thi -wo purani diary mil gayi to ghazalein publish kur di !! Is comment ke liye bahut bahut shukriya kyonki ye Mayank the beginer ki hausla afzai hai –regards -mayank

  3. अब तो हर क़त्बे पे है इक हादसे की दास्ताँ
    अब तो कब्रिस्तान में भी बेज़ुबाँ कोई नहीं
    donon ghazalen khoob hain bhaiya… par is she’r ka jawaab nahi… kya kahne

    • Swapnil Bhai !! abhaar -jab ye sankalan publish kiya tha tab in ghazalon me behar kai jagah durust nahin thi !! bahut alochana ka samana karana pada – Dada ne un ghazalon ko sire se kharij kur diya tha -ye kah kar ki ye ghazalein hain hi nahin -in ghazlon ko maine 4-6 months ke baad fir kaha tab ye shape aayi thi – 18 baras pahale ki diary mil gayi hai kuchh aur ghazalein age post karoonga –bahut bahut shukriya !! Eshwar aapako bulandiyan de –mayank

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