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शायर “पवन कुमार” का दमदार आग़ाज़ “बाबस्ता”

(ये समीक्षा मैने 4 बरस पहले लिखी गई थी –तब जो पवन कुमार जी से उम्मीद थी वो बिल्कुल सच साबित हुई है , आज वो सुखनफहमी और सुखनगोई में बडे हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हैं) –मयंक अवस्थी)
प्रकाशन संस्थान
4268-B/3
दरिया गंज
नई दिल्ली -110002

जैसी कि मेरी आदत है पुस्तक पढने के पहले मैने पवन कुमार जी की पुस्तक “बाबस्ता” के भी बीच के पृष्ठ पहले पलटे और ठिठक कर रह गया – पहली प्रतिक्रिया जो मन मे उभरी वो यह थी कि “ यह तो कामिल शायर का बयान है “ और दूसरी यह कि “जब आगाज़ इतना दमदार है तो इस शायर के बयान की इंतेहा क्या होगी “ मुझे हैरत भी हुई कि इज़हार की जिस पुख़्तगी के लिये बड़े बड़े शायरों को बरसों शायरी के अख़ाड़े में रियाज़ करना पड़ता है और फिर भी उनकी ग़ज़लों में रवानी और कथ्य की स्पष्टता का थोड़ा बहुत अभाव रह ही जाता है उनके भी मुकाबिल पवन कुमार जी की गज़लों के नोक पलक इतने दुरुस्त और खूबसूरत हैं कि मन में प्रशंसा के भी खूब भाव उपजे और मैं अहसासे –कमतरी से भी भर गया । उमीद से आगे का बयान है “ बाबस्ता” में जिसकी तस्दीक़ खुद आप इस पुस्तक को पढने पर करेंगे । अच्छे अश आर की संख्या सैकड़ो में है और जो शेर रिवायती हैं या जो अपने अहद से बाबस्ता होने के सबब उपजे हैं वो भी या तो अपने पर्फेक्शन या अपनी स्तरीयता के कारण पढने वाले को खासा प्रभावित करते हैं । ज़रूरी हो गया कि तफ्तीश की जाय कि इस मुरस्सा कलाम के पसमंज़र मे क्या है और जवाब मिला खुद पवन कुमार जी के ही शब्दों में कि उनकी गज़लों को मंज़रे –आम होने के पहले एक आइनाखाने की सुहबत नसीब है जिसके आइनों में जनाब मुहत्तरम अक़ील नोमानी और मेरे सबसे आदरणीय तुफैल चतुर्वेदी साहब जैसों के नाम शुमार हैं । पवन कुमार जी के लिये मेरे मन में सम्मान और भी अधिक बढ गया –यह उन विरल व्यक्तित्वों में हैं जो अपने आइनों का नाम भी मंज़रे आम करते हैं – साहित्य में आज की तारीख़ में इस सादगी और मेरे देखे इस बड़प्पन का कहत है ।
एक बार पढ्ने के बाद ही पवन कुमार जी की इस पुस्तक “बाबस्ता” ने दिल जीत लिया । दौरे –हाज़िर के सबसे आला शायरो में से एक श्री शीन क़ाफ़ निज़ाम साहब और अकील नोमानी साहब की पड़्ताल / भूमिकाऑ से सजी यह पुस्तक हर प्रशंसा की सच्ची हकदार है । पुस्तक में ग़ज़लें और नज़्में दोनो ही हैं । गज़लों मे सामाजिक सरोकार का पहलू प्रबल है –जबकि नज़्मों में परिवारिक दायरे , निजी सरोकार और आत्मकेन्द्रण की दिशायें मिलती हैं “ चाहिये और कुछ वुसअत मेरे बयाँ के लिये “ की राह पर पवन जी कीं नज़्में शिल्प का भार बहुत नहीं उठाती लेकिन जहाँ उनके अन्दर की नैसर्गिक मेधा आवश्यकता समझती है कुछ बेहद खूबसूरत जुमले वे इस्तेमाल कर ही लेती हैं ।
ग़ज़लॉ की बात मुख़्तलिफ है –गज़ले शिल्प की दृष्टि से बेहद मजबूत और भाव की दृष्ति से प्रभावशाली हैं ।और कुछ शेर जो पवन कुमार जी के नाम से मशहूर होंगे जैसे –
अम्न वालों की इस कवायद पर
सुनते हैं बुद्ध मुस्कुराये हैं

लॉफिंग बुद्धा –नहीं स्माइलिंग बुद्धा – जिस खूबी के साथ शांति स्थापना के राजनैतिक चोंचलों पर इस शेर में प्रहार किया गया है उसका जवाब नहीं –“ क़वायद” और “सुनते हैं” में तंज़ का जो बेहद कोमल स्पर्श है उसने बात कह दी और अदब की ज़ीनत बनी रही –यही स्तरीय शायरी की पहचान है । एक विख़्यात शेर है –
ऐ मौजे बला उनको भी ज़रा, दो चार थपेड़े हल्के से
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ाँ का नज़ारा करते हैं
“ दो चार थपेड़े हल्के से” – यानी शायर अपने चित्त की कोमलता से बाहर बयान नहीं देता ।
इज़हार की ऐसी ही संजीदगी पवन कुमार जी के बयान प्रति प्रश्ंसा के साथ साथ सम्मान का भाव भी पैदा करती है ।

मुझे ये ज़िन्दगी अपनी तरफ कुछ यूँ बुलाती है
किसी मेले में कुल्फी जैसे बच्चों को लुभाती है

ये भी बेहद खूबसूरत शेर है और मेले की कुल्फी के लुभावनेपन से ज़िन्दगी का फानी पहलू शायद पहली बार तश्बीह के तौर इस्तेमाल हुआ है – मीर की सुराब जैसी नुमाइश और हुबाब जैसी हस्ती जैसा ये शेर अपनी समकालीन अभिव्यक्ति के कारण ज़ुबान का शेर हुआ ।

गुज़ारिश अब बुज़ुर्गों से यही करना मुनासिब है
ज़ियादा हों जो उम्मीदे तो बच्चे टूट जाते है

हिन्दुस्तान की आबादी का 45% हिस्सा एक से 19 बरस की उम्र के दायरे का है और थ्री ईडिय्ट्स जैसी फिल्मों की कामयाबी सुबूत है कि –पवन कुमार जी ने कहीं भी कहा जा सकने वाला शेर कह दिया है ।
एक और सुन्दर शेर —
बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है
बच्चों को चुपचाप बिठा कर देख लिया

पबन कुमार जी की ग़ज़लों में मुनव्वर राअना साहब की तरह माँ पर भी शेर मिलते हैं नज़्मों में अपनी बेटी पर भी उन्होंने दो नज़्में कही हैं और जीवन संगिनी के लिये भी गहन भावभूमि में डूब कर अनेक पंक्तियाँ कही हैं – यहाँ वो जज़्बाती हैं और अच्छे लगते है—तस्व्वुफ के शेर उन्होंने कम कहे हैं इसलिये बयान में गज़ब की परदर्शिता है और वैचारिक उलझाव लगभग नहीं के बराबर है ।
इसके अतिरिक्त अच्छे शेर पुस्तक में हर प्रष्ठ पर मिलते हैं –

उतरा है खुदसरी पे वो कच्चा मकान अब
लाज़िम है बारिशों का मियाँ इम्तिहान अब

जहाँ हमेशा समन्दर ने मेहरबानी की
उसी ज़मीन पे क़िल्ल्त है आज पानी की

मुझे भी ख्वाब होना था उसी का
मेरी किस्मत कि वो सोया नहीं है

अजब ये दौर है लगते हैं दुश्मन दोस्तों जैसे
कि लह्रें भी मुसलसल रब्त रखती हैं सफीने से

पानियों का जुलूस देखा था
सख़्त चट्तान के दरकते ही

बिम्ब मे प्रतिबिम्ब बनाना कामिल शायर का हुनर होता है और उनके शेर इस कला में माहिर हैं –समकालीन सामजिक सन्दर्भ – अपने दौर की बेहिसी में मश्वरा देती स्वीकृति देती और संवाद करती उनकी गज़लों ने – फूल , तितली , ख्वाब , दर्द , फस्ल रोटी , सहरा , बागबाँ जैसे प्रचिलित अल्फाज़ ले कर गज़ल के चिर परिचित कैनवास पर जो हस्ताक्षर किये हैं वो स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं । लम्बा सफर करने के बाद किसी शायर को जो नाम और शुहरत मिलती है वो शायद उनको इस पहले संकलन से ही मिल गयी है – लेकिन इस उमीद की स्थिरता के लिये उनको इस आलेख में पहले क्वोट किये गये 4 अशआर जैसे अशआर निरंतर कहने पड़ेंगे क्योंकि उन अश आर पर पवन कुमार एक्स्क्लूसिव की मुहर लगी हुई है । शायरी का जो मेयार उनके पास है उसका सबसे अच्छा उपयोग यही होगा कि वो – बुद्ध मुस्कुराये है जैसे और भी कई शेर कहें-क्योंकि बेहद प्रभावशाली और बेहद खूबसूरत शेर तो उन्होंने कह दिये हैं अब ज़रूरत है औरों से पृथक दिखने की जिसका उनकी अगली पुस्तक में इंतज़ार रहेगा ।

मयंक अवस्थी
कानपुर

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