6 टिप्पणियाँ

T-29/53-2 ओज पर तुझको देखना है-“समर कबीर”

ओज पर तुझको देखना है मुझे
पत्र में उसने ये लिखा है मुझे

नस्ले-नौ से मदद का तालिब हूँ
बुर्ज नफ़रत का तोड़ना है मुझे

क्या कहूँ, कब मिलेगा मीठा फल
सब्र करना तो आ गया है मुझे

आज तेरे बग़ैर ये जीवन
नर्क जैसा ही लग रहा है मुझे

लाख दुश्वारियाँ हों, जाऊँगा
इश्क़ तेरा बुला रहा है मुझे

नर्म गुफ़्तार से “समर” देखो
आज फिर ज़ेर कर लिया है मुझे

“समर कबीर” 09753845522

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6 comments on “T-29/53-2 ओज पर तुझको देखना है-“समर कबीर”

  1. इस ग़ज़ल के प्रति अन्यतम आत्मीयता के भाव हैं, समर साहिब ! बार-बार मुबारकबाद.

  2. समर कबीर साहब ग़ज़ल की मुबारकबाद पेश है| कुबूल कीजिये |

  3. बहुत ख़ूब समेर कबीर साहब

  4. दूसरी ग़ज़ल भी अच्छी हुई। दाद क़ुबूल फ़रमाइये समर साहब। आपने मक़ते में वो बात कही जो मेरे दिल का आपसे बात करके हाल होता है

    नर्म गुफ़्तार से “समर” देखो
    आज फिर ज़ेर कर लिया है मुझे

  5. क्या कहूँ, कब मिलेगा मीठा फल
    सब्र करना तो आ गया है मुझे
    Samar kabeer sahe, umda ghazal k liye daad hazir hai

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