11 टिप्पणियाँ

T-29/49 वो बिगड़ता हुआ दिखा है मुझे-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

वो बिगड़ता हुआ दिखा है मुझे
साफ़गोई मगर बजा है मुझे

नाला-ए-दिल तरबफ़ज़ा है मुझे
इश्क़ अब रास आ गया है मुझे

दर्द को दिल में अब जगह कम है
और मतलूब इक विआ है मुझे

मौत फ़र्दा की बात है प अभी
ज़िन्दगी तुझसे मुद्दआ है मुझे

रोज़ पामाल हो रहा हूं मैं
ख़्वाब, दहलीज़ कर दिया है मुझे

एक अर्से के बाद ये दस्तक
कौन है? कौन पूछता है मुझे?

एक रिश्ते का ये सवाल भी है
क्यों बनाया जो तोड़ता है मुझे

इल्मे-मंज़िल मिरा क़ुबूल न था
खो गया जब तो ढूंढता है मुझे

वो मिरे हिज्र में न जी पाए
और कहती फिरे मुआ है मुझे

कुछ मिला है तो तिश्नगी कहिए
उस बदन से अगर मिला है मुझे

ऐ ग़मे-इश्क़ ये तो समझा दे
काटता या तराशता है मुझे

कायनात एक और एक बदन
कितना महदूद कर दिया है मुझे

है कमो-बेश ‘कैफ़’ की भी मीयाद
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’

मनोज मित्तल ‘कैफ़’ 09887099295

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11 comments on “T-29/49 वो बिगड़ता हुआ दिखा है मुझे-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

  1. वो बिगड़ता हुआ दिखा है मुझे
    साफ़गोई मगर बजा है मुझे
    सच की कीमत देनी ही पडती है एक मश्वरा है शास्त्र में –सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात न ब्रूयात सत्यम अप्रियम… लेकिन मुदआ ये है कि आप अप्रिय सत्य न भी बोलें तो भी अगर सुनने वाले का झूठ फना होता है तो उसे बुरा लगेगा !! मतले पर वाह !!
    नाला-ए-दिल तरबफ़ज़ा है मुझे
    इश्क़ अब रास आ गया है मुझे
    बहुत सोचता हूँ कि इश्क़ –मुहब्बत में ऐसा ख़ास क्या है कि इसे शाइरी का मर्क़ज़ –ज़िन्दगी का मर्क़ज़ तस्लीम किया गया – ज़िन्दगी तो उनकी भी अर्से तक असीर रही जिन्होंने नफरतें बोईं और इंसानियत को शर्मसार किया !! लेकिन कुल मिला कर निष्कर्ष ये है कि इश्क़ हमें स्व से अहँ से मुक्त करता है तत, वो पर केन्द्रित करता है और स्व, अहँ ,अभिमान से मुक्ति ही जीवन की मुक्ति है !! इसलिये जब तक इश्क अहंकार का परिपूरक रहता है तब तक दुखदाई है जब आप मिट जाते हैं तो सम्पूर्ण से जुड जाते हैं इसलिये इसका मर्तबा इतना ऊंचा है –इश्क अब रास आ गया है मुझे .. कब ??!! जब नाला ए दिल परवान चढा तब …. वाह वाह !!
    दर्द को दिल में अब जगह कम है
    और मतलूब इक विआ है मुझे
    इस लाल शेर को ग्रीन सिग्नल !!! WalkOver दिया !!!
    मौत फ़र्दा की बात है प अभी
    ज़िन्दगी तुझसे मुद्दआ है मुझे
    बिल्कुल साहब !! अरे वाह !!!उडने से पेश्तर आपका रंग ज़र्द नहीं है इस पर पूरी दाद !!!दाद !!!
    रोज़ पामाल हो रहा हूं मैं
    ख़्वाब, दहलीज़ कर दिया है मुझे
    ख़्वाब और बेदारियों की कश्मकश में आप पिस गये पामाल हो गये दहलीज़ बन गये !! क्या तस्व्वुर है !!! वाह वाह !!
    एक अर्से के बाद ये दस्तक
    कौन है? कौन पूछता है मुझे?
    कौन आया है यहाँ कोई न आया होगा
    मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा –क़ैफ़ भोपाली
    एक रिश्ते का ये सवाल भी है
    क्यों बनाया जो तोड़ता है मुझे
    वैसे तो हर मुलाकात का अंजाम जुदाई है लेकिन मित्तल साहब !! आप बडे अफसर RAS !के !!! आपसे रब्त इसीलिये बनाया था कि जयपुर में अपने कई काम अटके थे –लेकिन आपने पहला शेर कह दिया साफ्गोई वाला इसलिये अब किसी और को तलाशेंगे हा ssss हाSSss हाsssss!! देखिये तकल्लुफ बरतरफ … लेकिन यही सच्चा जवाब है इसका –क्यो बनाया जो तोडता है मुझे का !!! शेर पर दाद !!
    इल्मे-मंज़िल मिरा क़ुबूल न था
    खो गया जब तो ढूंढता है मुझे
    ऐसा बहुत बार हुआ है कि कमनज़र होने के कारण हम इल्म वालों को पहले खो देते हैं और बाद में ढूंढते हैं !!!
    वो मिरे हिज्र में न जी पाए
    और कहती फिरे मुआ है मुझे
    अय अय हय हय हय ….!! क्या बात है मालिक!!! मीर बोले कि, दाग़ बोले कि ग़ालिब, बोले –ये ज़ुबान !!?? “मुआ” तो पूरी दाद लूट ले गया वाह वाह !!!
    कुछ मिला है तो तिश्नगी कहिए
    उस बदन से अगर मिला है मुझे
    बहुत खूब !! वाह वाह !! ये शेर गर्म है !!!
    ऐ ग़मे-इश्क़ ये तो समझा दे
    काटता या तराशता है मुझे
    काटेगा नहीं तो तराशेगा कैसे !! दोनो काम बद्स्तूर मुस्ल्सल करता है ये ग़मे- इश्क़ !! कुछ बदबख़्त हमारे जैसे भी हैं जिन्हें इतना काट देता है कि तराशने को कुछ बचता नहीं !!!
    कायनात एक और एक बदन
    कितना महदूद कर दिया है मुझे
    बुलन्द तस्व्वुर है !!
    है कमो-बेश ‘कैफ़’ की भी मीयाद
    ‘अपने अंजाम का पता है मुझे’
    बहुत खूबसूरत तख़ल्लुस का बेहतरीन इस्तेमाल गिरह मक़्ता सही जगह पर आये हैं !!!
    मनोज मित्तल ‘कैफ़’ साहब !!! बेशक लाजवाब ग़ज़ल कही है !!! दाद दाद और दाद –मयंक

  2. हाय ऐसे शेर मैं क्यों नहीं कह पाता ? क्या ही उम्दा शेर कहे वाह वाह हज़ारों दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    रोज़ पामाल हो रहा हूं मैं
    ख़्वाब, दहलीज़ कर दिया है मुझे

    एक अर्से के बाद ये दस्तक
    कौन है? कौन पूछता है मुझे?

  3. एक अर्से के बाद ये दस्तक
    कौन है? कौन पूछता है मुझे? ,,,,,,,, Kaif saheb, mubarakbad pesh karta hun

  4. एक अर्से के बाद ये दस्तक
    कौन है? कौन पूछता है मुझे?

    एक रिश्ते का ये सवाल भी है
    क्यों बनाया जो तोड़ता है मुझे
    Lajawab gazal hui sir
    Dili daad qubul kijiye

  5. मनोज जी आपकी ग़ज़ल हमेशा ही लुत्फ़ देती है | शेर कहने का आपका अपना ही अंदाज़ है|
    मतले से मकते तक बेहतरीन अशआर हुए हैं | कोई शेर कम नहीं है | मुबारकबाद कुबूल फरमाइए |

  6. Kaif sahab bahut umda ashaar se gunthi hae aapki gazal…
    Dheron daad haazir hae
    Sadar
    Pooja

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