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T-29/45 रोज़ अंदेशा ताकता है मुझे-बकुल देव

रोज़ अंदेशा ताकता है मुझे
मुस्कुराना तो ज़लज़ला है मुझे

रास्तों के लिये हुआ मैं सरल
यानी अबके सफ़र कड़ा है मुझे

आ ज़रा काइनात ! हाथ बंटा
उसने पूरा नहीं रचा है मुझे

अक्स होता हूं उसकी आंखों में
आइना ये नया नया है मुझे

जल रहा है वुजूद मिस्ले-चराग़
रौशनी ही मिरी हवा है मुझे

मैं भी शामिल हूं इस ख़राबे में
ये ख़राबा ही मुद्दआ है मुझे

गूंजता है ख़ला में सन्नाटा
मेरा हिस्सा पुकारता है मुझे

ज़िन्दगी है वो सानिहा कि जिसे
वक़्त रहते ही टालना है मुझे

अब बिखर जाऊं तो ख़सारा नहीं
उसने बांहों में भर लिया है मुझे

कुछ ख़बर ही नहीं है अपने तईं
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’

बकुल देव 09672992110

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6 comments on “T-29/45 रोज़ अंदेशा ताकता है मुझे-बकुल देव

  1. जियो मेरी जान। ज़िंदाबाद, क्या ही बुलंद शेर कहा। आपमें बड़ी शायरी की सम्भावनाएं हैं। वाह वाह तेज़ी से मेहनत कीजिये।

    गूंजता है ख़ला में सन्नाटा
    मेरा हिस्सा पुकारता है मुझे

  2. Aa zaraa kaainaat ! haath banta…waah waah waah…bakul ji behad khoobsoorat gazal…dheron daad haazir hae
    Sadar
    Pooja

  3. अब बिखर जाऊं तो ख़सारा नहीं
    उसने बांहों में भर लिया है मुझे
    Bakuldeo saheb, bharpoor ghazal hui hai, Wah

  4. अक्स होता हूं उसकी आंखों में
    आइना ये नया नया है मुझे

    जल रहा है वुजूद मिस्ले-चराग़
    रौशनी ही मिरी हवा है मुझे

    मैं भी शामिल हूं इस ख़राबे में
    ये ख़राबा ही मुद्दआ है मुझे

    गूंजता है ख़ला में सन्नाटा
    मेरा हिस्सा पुकारता है मुझे

    अब बिखर जाऊं तो ख़सारा नहीं
    उसने बांहों में भर लिया है मुझे

    बकुल भाई…अहा.. कैसे कैसे शेर कह दिए हैं भाई …ज़ेहन गूँज उठा…वाह वाह वाह … क्या कहना ….

    एक एक शेर बेहतरीन … बहुत मुबारकबाद

  5. रोज़ अंदेशा ताकता है मुझे
    मुस्कुराना तो ज़लज़ला है मुझे
    Ye Ek mindstate hai jisme hamaara daur ji raha hai ya mur raha hai – matale ko daad !!
    रास्तों के लिये हुआ मैं सरल
    यानी अबके सफ़र कड़ा है मुझे
    bahut achcha poetic expression hai !!

    आ ज़रा काइनात ! हाथ बंटा
    उसने पूरा नहीं रचा है मुझे
    Kya tasvvuf hai !!! I,m phenomenal , ephemeral, Ive been created for the time being -a part of contemporary time segment –Always under the process of divine modificaqtion –wah wah

    जल रहा है वुजूद मिस्ले-चराग़
    रौशनी ही मिरी हवा है मुझे
    Jo miri roshni hai zati hai
    dil diya hai umeed bati hai
    main wo patthar hun jisme muddat se
    sans aati hai sans jati hai

    मैं भी शामिल हूं इस ख़राबे में
    ये ख़राबा ही मुद्दआ है मुझे
    Is sher ka ek pahaloo ye hai ki -despite being part of a system we behave as critics -declining to be a part of the same system — Ye sher apani haisiyat aur responsibility ko tasleem karata hai –wah !!

    गूंजता है ख़ला में सन्नाटा
    मेरा हिस्सा पुकारता है मुझे
    Body senses , wit ego soul ke ilawa bhi hum sarapa wazood hain –wah wah !!

    ज़िन्दगी है वो सानिहा कि जिसे
    वक़्त रहते ही टालना है मुझे
    saniha !!!! great This is the tritration point of this sher !!

    अब बिखर जाऊं तो ख़सारा नहीं
    उसने बांहों में भर लिया है मुझे
    UFFFFFFFFFFFFFFFFF Wah wah !! yahan to kamaaaaaaaaaaal kur diya wah wah !! hasile ghazal sher !!
    Bakul bhai !! aap heeera hain !! Aisi shiri Malik ki mehar se hi mumkinhoti hai !! Ye kulam aise hi chalata rahe bahut khoob wah wah –Mayank

  6. आ ज़रा काइनात ! हाथ बंटा
    उसने पूरा नहीं रचा है मुझे

    गूंजता है ख़ला में सन्नाटा
    मेरा हिस्सा पुकारता है मुझे

    kya kahne bakuldeo sahab waahh wahh aur waahh
    saikadon daad

    Alok

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