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T-29/44 भीगी आँखों से देखता है मुझे-शबाब मेरठी

भीगी आँखों से देखता है मुझे
आइना, जाने क्या हुआ है मुझे

मेरा सपना बड़ा है आँखों से
फिर भी हर वक़्त देखना है मुझे

दर्द है, आग है, मुहब्बत है
कौन आख़िर तराशता है मुझे

ज़ब्त अपनी सी करके मानेगा
कुछ न कुछ आज बोलना है मुझे

नाम भी शहद जैसा लगता है
जब कभी वो पुकारता है मुझे

मुझको जाना है और घर मेरा
अपनी दाँतों से खींचता है मुझे

रास्ते ख़त्म हो गए सारे
हौसला अब चला रहा है मुझे

गहरी चुप्पी की भाषा है जिसकी
कोई कुंजी बना रहा है मुझे

तेरी साँसे जो छीन लेती हैं
उन हवाओं को रोकना है मुझे

दुःख तो मेरा है सिर्फ़ मेरा है
और सुख सबको बांटना है मुझे

मेरे भीतर की लौ उसी की है
वो जो हँस कर जला रहा है मुझे

नींद की ये रुंधी रुंधी साँसें
जैसे कोई जगा रहा है मुझे

शबाब मेरठी 09997220102

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12 comments on “T-29/44 भीगी आँखों से देखता है मुझे-शबाब मेरठी

  1. Shabab saheb, apki ghazal ki rawani dekhkar aisa lagta hai k jaisi sheiron ki aap par barsat ho rahi ho , kamal hai. wah

  2. haay ..kya hi kahna…..waah waahh waahh aur waahhhhh

    kya kahne shabaab sahab
    aap har bar kamaal karte hai

    di ban gaya

    sadar
    Alok

  3. Shabaab saahab kya hi umda ashaar hue hein…waah.. dher sari daad or mubarakbaad hazir hae
    Sadar
    Pooja

  4. Bahut umda Ghazal dheron daad wah wah kya kahne

  5. मेरा सपना बड़ा है आँखों से
    फिर भी हर वक़्त देखना है मुझे
    Lajawab ghazal hui sir
    Wahhhhhhh Wahhhhhhh
    Regards
    Imran

  6. वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई है सर जी ///////////////// बधाई ……………

  7. अच्छा हुआ ये ग़ज़ल मैंने अपनी ग़ज़ल कहने से पहले नहीं पढ़ी

    पूरा हौसला ही टूट जाता इस ज़मीन में शेर कहने का …..

    ज़िंदाबाद शबाब साहब ज़िंदाबाद

  8. शबाब साहब !! सभी शेर अच्छे कहे हैं !! जो ज़ियादा अच्छे लगे उनपर कह रहा हूँ –
    मेरा सपना बड़ा है आँखों से
    फिर भी हर वक़्त देखना है मुझे
    छोटे फ्रेम में बडी तस्वीर नहीं आती –लेकिन आदमी की कुव्वते गोयाई की कोई सरहद नहीं – “मेरा सपना बडा है आँखों से” इस मिसरे के लिये आपको सैकडों दाद !!
    मुझको जाना है और घर मेरा
    अपनी दाँतों से खींचता है मुझे
    एक शेर शपर रसूल का – मुझे भी लम्हा ए हिज्रत ने कर दिया तक़्सीम
    निगाह घर की तरफ है कद्म सफर की तरफ
    आपके शेर में दाँतों से खींचना ने जो बात पैदा की है उसका जवाब नहीं
    रास्ते ख़त्म हो गए सारे
    हौसला अब चला रहा है मुझे
    आखिर को थक के बैठ गई इक मुकाम पे
    कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी –शिकेब
    अब अगले मील के पत्थर आप होंगे !!!
    मेरे भीतर की लौ उसी की है
    वो जो हँस कर जला रहा है मुझे
    अब उसकी आग में शबरंग हैं तो क्या शिकवा
    उसी के नूर से जिस्मों के थे दिये रोशन-मयंक
    मेरा क्या ??!! सब उसी का है वो जिसने नाम लिखा ज़िन्दगी के कागज़ पर // ये और बात , वही बाद में मिटाता है – हम किसी अज्ञात के डेरिवेटिव हैं इसलिये गिला क्या ??!!
    आँखों से बडा सपना , दाँतों से खींचता घर !! शबाब साहब !! ज़ुबान और मंज़र से क्या क्या तलाश्ते और तराशते हैं आप वाह वाह !! –मयंक

  9. मुझको जाना है और घर मेरा
    अपनी दाँतों से खींचता है मुझे

    Zindabad Dinesh Bhai…Jiyo

  10. शबाब मेरठी साहब जिंदाबाद, मुरस्सा ग़ज़ल हुई है | हर शेर शानदार |
    ढेरों दाद हाज़िर हैं |

  11. लाज़वाब वाआआआआआआआआआआआआआःह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् दिनेश साहेब एक शेर का ज़िक़्र करना न्याय नही होगा अशआर सभी ही खूब हैं वाह

  12. शबाब साहब, वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह क्या ग़ज़ल कही है। हर शेर हीरा बल्कि कोहे-नूर है। ज़िंदाबाद। आपकी ग़ज़ल से तरही का स्तर उन्नत हुआ

    भीगी आँखों से देखता है मुझे
    आइना, जाने क्या हुआ है मुझे

    मेरा सपना बड़ा है आँखों से
    फिर भी हर वक़्त देखना है मुझे

    दर्द है, आग है, मुहब्बत है
    कौन आख़िर तराशता है मुझे

    ज़ब्त अपनी सी करके मानेगा
    कुछ न कुछ आज बोलना है मुझे

    नाम भी शहद जैसा लगता है
    जब कभी वो पुकारता है मुझे

    मुझको जाना है और घर मेरा
    अपनी दाँतों से खींचता है मुझे

    रास्ते ख़त्म हो गए सारे
    हौसला अब चला रहा है मुझे

    गहरी चुप्पी की भाषा है जिसकी
    कोई कुंजी बना रहा है मुझे

    तेरी साँसे जो छीन लेती हैं
    उन हवाओं को रोकना है मुझे

    दुःख तो मेरा है सिर्फ़ मेरा है
    और सुख सबको बांटना है मुझे

    मेरे भीतर की लौ उसी की है
    वो जो हँस कर जला रहा है मुझे

    नींद की ये रुंधी रुंधी साँसें
    जैसे कोई जगा रहा है मुझे

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