10 टिप्पणियाँ

T-29/41 मुझसे जो शख़्स जोड़ता है मुझे-आसिफ़ अमान

मुझसे जो शख़्स जोड़ता है मुझे
उससे दरकार फ़ासला है मुझे

जंग ख़ुद से कभी जहां से निबाह
काम आसान कब मिला है मुझे

रह के कुछ पत्थरों की सुहबत मैं
मोम होना भी आ गया है मुझे

वो मुझे सोचता है क्यूँ दिन-रात
सीरियस हो के सोचना है मुझे

लाज़मी है वफ़ा पे घबराना
तजरबा ये नया नया है मुझे

ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
और सारा कमा लिया है मुझे

जो मेरे रूबरू है उसको ‘अमान’
बंद आँखों मैं देखना है मुझे

आसिफ़ अमान 09971929082

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10 comments on “T-29/41 मुझसे जो शख़्स जोड़ता है मुझे-आसिफ़ अमान

  1. लाज़मी है वफ़ा पे घबराना
    तजरबा ये नया नया है मुझे

    ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
    और सारा कमा लिया है मुझे

    जो मेरे रूबरू है उसको ‘अमान’
    बंद आँखों मैं देखना है मुझे

    Ghazal padhkar ehsaas hua k ‘shairi waqai hai iska naam.’ daad qubool karen

  2. आये भी तो फ़क़त छुआ है मुझे
    हादिसों से यही गिला है मुझे
    कलेजे की बात है इस शेर में !! देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के जैसी बात है … वाह वाह !!
    अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे
    बहुत खूब बहुत खूब !!! क्या शेर कहा है दाद …
    उससे मिलने की है यही सूरत
    सिर्फ़ ख़्वाबों का आसरा है मुझे
    फिर दाद !! शेर की कहन पर ..
    छाछ पीता हूँ फूंक-फूंक के मैं
    चाँद की रौशनी दिया है मुझे
    एक किरदार बनाया है जिसकी ज़िन्दगी में ज़िन्दगी का कहत है –वाह !!
    लाख हँस दूँ तिरी ख़ताओं पे
    पर हक़ीक़त में टूटना है मुझे
    अपना एक शेर याद आया- हम अपने दोस्तो के तंज़ सुंकर मुस्कुराते हैं
    मगर उस वक़्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है
    मेरी फ़ितरत मे साफ़गोई है
    “अपने अंजाम का पता है मुझे”
    अच्छी गिरह !!
    दीगर अशआर भी अच्छे कहे हैं। ग़ज़ल साफ सुथरी है बिमलेन्दु भाई बहुत बहुत बधाई –मयंक

  3. जंग ख़ुद से कभी जहां से निबाह
    काम आसान कब मिला है मुझे
    Lajawab ghazal amaan bhai
    Dili daad qubul kijiye

  4. लाज़मी है वफ़ा पे घबराना
    तजरबा ये नया नया है मुझे

    जो मेरे रूबरू है उसको ‘अमान’
    बंद आँखों मैं देखना है मुझे

    कैसे अच्छे अच्छे शेर कहे हैं भाई ….क्या कहा जाए ….बाकी तस्सल्ली से दाद तो आपको फोन पे दे ही चूका हूँ

    और इस शेर का तो कोई जवाब ही नहीं ….बेहतरीन ….वाह वाह वाह

    ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
    और सारा कमा लिया है मुझे

  5. अच्छे शेर की पहचान क्या है ??!! दोनो मिसरे स्वतंत्र भी मुकम्मल बयान हों !! दोनो का रब्त जो तीसरा रंग पैदा करे –वही शेरियत है!! और अन्दाज़े बयाँ –फल्सफे, मश्वरे, सलिलाकी , या इज़हार के सैकडों आयामो में किसी भी सूरत में आयें। सानी मिसरा आम कहन का जुमला हो तो कहना ही क्या !! इसके बाद आसिफ भाई क्या कहूँ ??! कोई भी देख सकता है इन कसौटी पर शानदार ग़ज़ल कही है आपने !!! इन शेरों पर विशेष दाद !! –मयंक
    जंग ख़ुद से कभी जहां से निबाह
    काम आसान कब मिला है मुझे
    ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
    और सारा कमा लिया है मुझे
    जो मेरे रूबरू है उसको ‘अमान’
    बंद आँखों मैं देखना है मुझे

  6. आसिफ़, वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही अच्छी है मगर ये शेर बिल्कुल नया है। वाह वाह, अच्छी ग़ज़ल के लिए सैकडों दाद

    लाज़मी है वफ़ा पे घबराना
    तजरबा ये नया नया है मुझे

  7. वाह आसिफ भाई क्या खूब ग़ज़ल कही है |

    वो मुझे सोचता है क्यूँ दिन-रात
    सीरियस हो के सोचना है मुझे
    ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
    और सारा कमा लिया है मुझे

    ढेरों दाद हाज़िर हैं भाई, कुबूल कीजिये |
    सत्य चंदन

  8. जंग ख़ुद से कभी जहां से निबाह
    काम आसान कब मिला है मुझे

    लाज़मी है वफ़ा पे घबराना
    तजरबा ये नया नया है मुझे

    kya achche ashaar hain… wah

  9. ख़र्च ख़ुद को ज़रा सा तुमने किया
    और सारा देखो कमा लिया है मुझे….वाह….
    अमान साहब अच्छी ग़ज़ल हुई है। सीरियसली अच्छी ग़ज़ल हुई है☺। ढेरों दाद और मुबारक़बाद
    सादर
    पूजा

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