17 टिप्पणियाँ

T-29/40 आये भी तो फ़क़त छुआ है मुझे-बिमलेन्दु कुमार

आये भी तो फ़क़त छुआ है मुझे
हादिसों से यही गिला है मुझे

अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
उसने कितना बदल दिया है मुझे

उससे मिलने की है यही सूरत
सिर्फ़ ख़्वाबों का आसरा है मुझे

छाछ पीता हूँ फूंक-फूंक के मैं
चाँद की रौशनी दिया है मुझे

लाख हँस दूँ तिरी ख़ताओं पे
पर हक़ीक़त में टूटना है मुझे

लोग समझें अजब तो समझा करें
कुछ भी हो जी के देखना है मुझे

मै रहा तीन मे न तेरह में
अपना किरदार तौलना है मुझे

घर तलक उनको छोड़ आऊँ क्या
आखिरी बार पूछना है मुझे

लाज के मेघ आज बरसेंगे
ऐसा महसूस हो रहा है मुझे

मेरी फ़ितरत मे साफ़गोई है
“अपने अंजाम का पता है मुझे”

बिमलेन्दु कुमार 09711381945

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17 comments on “T-29/40 आये भी तो फ़क़त छुआ है मुझे-बिमलेन्दु कुमार

  1. kya baat hai bimal bhai waah waah
    ab n hansta hu n rota hu wala sher to bahut hi umdah hua hai
    dher sari daad

    Alok

  2. अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे

    उससे मिलने की है यही सूरत
    सिर्फ़ ख़्वाबों का आसरा है मुझे
    Bahut achi gazal hui bhaia
    Dili daad qubul kijiye

  3. bimal bahut acchi ghazal hai…
    अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे
    ye she’r to bahut accha hua hai… dheron daad

  4. अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे

    बिमलेन्दु भाई …बला का शेर हुआ है …वाह वाह …देर तक साथ रहेगा ….

    तमाम ग़ज़ल बहुत पसंद आई

  5. विमलेन्दु कुमार जी अच्छी ग़ज़ल हुई है |
    दाद कुबूल फरमाएं |
    सत्य चंदन

  6. वाआह शानदार गजल विमलेन्दु जी

  7. वाह वाह बिमलेन्दु, अच्छी ग़ज़ल कही। ये चार शेर तो जैसे जी को छू गये। आपको अधिक कहना चाहिये

    अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे

    उससे मिलने की है यही सूरत
    सिर्फ़ ख़्वाबों का आसरा है मुझे

    लोग समझें अजब तो समझा करें
    कुछ भी हो जी के देखना है मुझे

    मै रहा तीन मे न तेरह में
    अपना किरदार तौलना है मुझे

  8. अब न हँसता हूँ और न रोता हूँ
    उसने कितना बदल दिया है मुझे

    लाख हँस दूँ तिरी ख़ताओं पे
    पर हक़ीक़त में टूटना है मुझे

    Is behtareen ghazal ke liye dheron daad kaboolen. Jiyo Bimlendu…

  9. आये भी तो फ़क़त छुआ है मुझे
    हादिसों से यही गिला है मुझे

    घर तलक उनको छोड़ आऊँ क्या
    आखिरी बार पूछना है मुझे….
    वाह वाह वाह….बिम्लेंदु जी अच्छी ग़ज़ल हुई है। और ये अश्आर तो कमाल ही हुए हैं।
    दाद हाज़िर है।
    सादर
    पूजा

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