14 टिप्पणियाँ

T-29/34 जाने किस रंग ने लिखा है मुझे-मनीष शुक्ला

जाने किस रंग ने लिखा है मुझे
हर कोई साफ़ देखता है मुझे

कोई बैठा हुआ सितारों में
अर्श की सिम्त खेंचता है मुझे

तेरे होंठों पे क्यूँ नहीं आता
तेरे चेहरे पे जो दिखा है मुझे

मैं जिसे रास्ता दिखाता था
ताक़ पर वो ही रख गया है मुझे

मैंने उस पार झांकना चाहा
आसमाँ साथ ले गिरा है मुझे

मैंने आँखें निचोड़ कर रख दीं
अब कहाँ ख़्वाब सूझता है मुझे

एक चेहरा ही हो गया मुबहम
और सब कुछ तो हाफ़िज़ा है मुझे

हर सहर तीरगी लिए आये
जाने किस शब की बद्दुआ है मुझे

मेरा सारा बदन पसीज गया
भीगी नज़रों से क्यूँ छुआ है मुझे

मनीष शुक्ला 09415101115

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14 comments on “T-29/34 जाने किस रंग ने लिखा है मुझे-मनीष शुक्ला

  1. bahot umdah gazal hui hai maneesh sahab
    dili mubarakbad

    sadar
    Alok

  2. जाने किस रंग ने लिखा है मुझे
    हर कोई साफ़ देखता है मुझे
    ye matala khud ek amantraN hai ki -ghazal kitani shaffaf aur transparent hai !! koi aiyaari nahin alfaaz ki -fir bhi aala darze ki meyaaari ghazal kahi hai !! koi aaropit falsafa nahin lekin kainati manazir ke hawale se rooh ki gaeharaiyon talak ahasaas pahunch gaya !! wah wha Maneesh bhai !! behad khoobsoorat bayan hai ye !! ek mukhtalif sher ke taur par bhi matale par saikadon Daad !!

    कोई बैठा हुआ सितारों में
    अर्श की सिम्त खेंचता है मुझे
    sublimation of divine potential of human being !!! Insaan sabase bada karishma hai kudarat ka aur isaki chetana ki gati oordhwamukhi hai !! humari vusaat poore bramhaand tak hai !!
    तेरे होंठों पे क्यूँ नहीं आता
    तेरे चेहरे पे जो दिखा है मुझे
    pasmanzar me muhabbat ka gulabi ranga hai jo mohak hai !! waise is sher ke multiple extentions ho sakate hain !!

    मैं जिसे रास्ता दिखाता था
    ताक़ पर वो ही रख गया है मुझे
    is faslon ke dasht me rahabar vahi bane
    jisaki nigah dekh le sadiyon ke paar bhi –shikeb

    मैंने उस पार झांकना चाहा
    आसमाँ साथ ले गिरा है मुझे
    ek sher Maneesh bhai apana quote kur raha hun —
    azal abad ki hadon me tawaaf karata hun
    mere makan ke dono daron pe taala hai –mayank

    मैंने आँखें निचोड़ कर रख दीं
    अब कहाँ ख़्वाब सूझता है मुझे
    aankhein nichod dena bahut maanikhez istemaal hai wah wah !!

    हर सहर तीरगी लिए आये
    जाने किस शब की बद्दुआ है मुझे
    zindagi ki hur umeed shal ho jaati hai !! hum aise daur me janme hain –bahut achha kaha hai !!

    मेरा सारा बदन पसीज गया
    भीगी नज़रों से क्यूँ छुआ है मुझे

    seene ko mere sang wo hone nahin detaa
    kuchh mom ke jaisa bhi isi sil me chhupa hai

    Maneesh bhai !! is Ghazal ke liye apako dher sari mubarakbaad !! bahut aala bayan hai –mayank

  3. जाने किस रंग ने लिखा है मुझे
    हर कोई साफ़ देखता है मुझे

    मैं जिसे रास्ता दिखाता था
    ताक़ पर वो ही रख गया है मुझे

    मैंने आँखें निचोड़ कर रख दीं
    अब कहाँ ख़्वाब सूझता है मुझे

    मनीष जी … बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है वाह ….

    मतला तो कमाल का है

  4. koi baitha h sitaron me waaah khoibsurt sher khoob pyari ghazal mubhark ho maniish saheb

  5. मनीष साहब, अच्छी ग़ज़ल के लिए दाद स्वीकार कीजिये। ये दोनों शेर लाजवाब हुए हैं वाह वाह

    कोई बैठा हुआ सितारों में
    अर्श की सिम्त खेंचता है मुझे

    तेरे होंठों पे क्यूँ नहीं आता
    तेरे चेहरे पे जो दिखा है मुझे

  6. Manish Bhai …Kya kahun ? Kuchh soojh hi nahin raha …bolti band hai janab…Bejod Ghazal…waah waah …Jiyo

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