10 टिप्पणियाँ

T-29/30 सुर बुरा है न कुछ भला है मुझे-असरार उल हक़ ‘असरार’

सुर बुरा है न कुछ भला है मुझे
वक़्त का राग अलापना है मुझे

दिल है गुमकरदा-रह पता है मुझे
और अब दिल ही रहनुमा है मुझे

जाने कैसा उसे दिखाई दूँ
अपने क़द से वो नापता है मुझे

चक दर चाक हूँ मैं कोशिशे-जां
ज़िन्दगी ने बहुत सिया है मुझे

चाहता हूँ मैं अपनी उम्र दराज़
सोचता हूँ कि क्या हुआ है मुझे

मां की सूरत अज़ीज़ रखता है
दर्द ने गोद ले लिया है मुझे

अक्स दर अक्स हूँ बहर-जानिब
शहर ने आइना किया है मुझे

पूछता है वो हर सितम के बाद
ये पुराना है या नया है मुझे

और क्या सीखने को बाक़ी है
ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे

हो गया ख़ुद बरहनगी का शिकार
उसने गो बेरिदा किया है मुझे

वुसअतें थीं सिकंदरी मेरी
क़ब्र ने मुख़्तसर किया है मुझे

काश ‘असरार’ मैं समझ पाता
नारवा क्या है क्या रवा है मुझे

असरार उल हक़ ‘असरार’ 09410274896-09568398400

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10 comments on “T-29/30 सुर बुरा है न कुछ भला है मुझे-असरार उल हक़ ‘असरार’

  1. दिल है गुमकरदा-रह पता है मुझे
    और अब दिल ही रहनुमा है मुझे

    पूछता है वो हर सितम के बाद
    ये पुराना है या नया है मुझे

    अक्स दर अक्स हूँ बहर-जानिब
    शहर ने आइना किया है मुझे

    और क्या सीखने को बाक़ी है
    ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे

    असरार साहब इस पांच सितारा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारक़बाद

    क्या ही अच्छे शेर हुए हैं … वाह

  2. सुर बुरा है न कुछ भला है मुझे
    वक़्त का राग अलापना है मुझे
    बिल्कुल !!
    अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
    रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं –निदा
    जाने कैसा उसे दिखाई दूँ
    अपने क़द से वो नापता है मुझे
    हर नज़र बस अपनी अपनी रोशनी तक जा सकी
    हर किसी ने अपने पने ज़र्फ तक पाया मुझे
    मां की सूरत अज़ीज़ रखता है
    दर्द ने गोद ले लिया है मुझे
    बहुत खूब !! बहुत मार्मिक !!
    और क्या सीखने को बाक़ी है
    ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे
    इससे ज़ियादा कुव्वते –गोयाई और क्या होगी !! बहुत खूब!!
    वुसअतें थीं सिकंदरी मेरी
    क़ब्र ने मुख़्तसर किया है मुझे
    लौहे मज़ार देख के दिल दंग रह गया
    हर सिर के साथ एक फकत संग रह गया – ज़हीर कश्मीरी
    उस्तादाना गज़ल की बात ही कुछ और होती है –जैसे कि यह ज़मीन इसी ग़ज़ल के लिये थी॥ अल्फाज़ और मानी पर कितना ज़बर्दस्त इख़्तियार है कि आस्मान जैसे ऊंचे ख्याल ज़मीन पर उतरते चले आ रहे हैं !! बिलाशक ये ग़ज़ल मुसल्सल कही गई होगी इसकी रवानी इस बात की निशान्देही कर रही है –लेकिन कितने ऊंचे मेयार की कितनी लासानी गज़ल कही है असरार साहब !! ज़ुबान आपकी बाँदी है और इज़हार शागिर्द – सैकडों दाद हाज़िर हैं इस मुरस्सा कलाम के लिये –मयंक

  3. खूब वाह शानदार ग़ज़ल

  4. bahot achchi ghazal… achcher sher nikale aapne janaab…

  5. Bahut umda ghazal hui hai asrar sahab.. kya kahne…

  6. Bejod Ghazal , har ashaar motiyon ki tarah khoobsurti se apni jagah jada hua ,…ufff yu maa type…waah waah

  7. Bohot hi umda gazhal….
    Makte pe khaas daad kubool farmayein…

    काश ‘असरार’ मैं समझ पाता
    नारवा क्या है क्या रवा है मुझे

  8. और क्या सीखने को बाक़ी है
    ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे

    kya kahne asraar sahab
    bahut umdah

    dili daad

    sadar
    Alok

  9. और क्या सीखने को बाक़ी है
    ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे…aahaaaa kya kahne asraar sahab..
    Daad haazir hae
    Sadar
    Pooja

  10. धड़धड़ाते हुए एक पर एक लगातार उतरते हुए शेर जैसे कोई दरिया बहाव पर आया हो। ऐसे सोचने को दावत देने वाले शेर…….ये ग़ज़ल है कि ज़लज़ला है कोई ? पुराने चावल पुराने चावल ही होते हैं। वाह वाह

    जाने कैसा उसे दिखाई दूँ
    अपने क़द से वो नापता है मुझे

    चक दर चाक हूँ मैं कोशिशे-जां
    ज़िन्दगी ने बहुत सिया है मुझे

    मां की सूरत अज़ीज़ रखता है
    दर्द ने गोद ले लिया है मुझे

    अक्स दर अक्स हूँ बहर-जानिब
    शहर ने आइना किया है मुझे

    और क्या सीखने को बाक़ी है
    ख़ुद पे हँसना तो आ गया है मुझे

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