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T-29/27 एक डर सा लगा हुआ है मुझे-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

एक डर सा लगा हुआ है मुझे
वो बिना शर्त चाहता है मुझे

खुल के रोने के दिन तमाम हुए
अब मिरा ज़ब्त देखना है मुझे

मशविरे आप अपने पास रखें
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’

सोचता हूँ कि शह्र छोड़ ही दूँ
यां पे हर शख़्स जानता है मुझे

मर रहा हूँ इसी सुकून के साथ
साँस लेने का तजरुबा है मुझे

एक जां एक तन हैं हिज्र और मैं
तेरा आना भी अब सज़ा है मुझे

अब मैं ख़ामोश होने वाला हूँ
क्या कोई शख़्स सुन रहा है मुझे?

चुप रहा मैं इसी लिये ‘कान्हा’
मुझसे बेहतर वो जानता है मुझे

प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ 09911568839

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23 comments on “T-29/27 एक डर सा लगा हुआ है मुझे-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. क्या कहने भाई.. एक-एक शेर लाजवाब है..
    बेहद खूबसूरत !!

  2. वाह वाह वाह …

    कैसे कैसे शेर …अहा… कैसे कैसे मिसरे… किसी दरिया की तरह … रवां दवां… अहा अहा

    बला की शेर कही है ….वाह

  3. एक जां एक तन हैं हिज्र और मैं
    तेरा आना भी अब सज़ा है मुझे

    Jiyo Prkhar kya hi khoobsurat ghazal kahi hai aapne…lajawab…dheron daad kabool karen.

  4. एक डर सा लगा हुआ है मुझे
    वो बिना शर्त चाहता है मुझे
    ये धडका नाजाइज़ नहीं !! बिना शर्त चाहने वाली शय का नाम नहीं लेना चाह्ता मैं –उससे मुझे भी बहुत डर लगता है !!
    सोचता हूँ कि शह्र छोड़ ही दूँ
    यां पे हर शख़्स जानता है मुझे
    इस शेर में कान्हा एक पुराने शेर की इको है — नक्शा उठा के कोई नया शहर देखिये
    इस शह्र में तो सबसे मुलाकात हो गई
    मर रहा हूँ इसी सुकून के साथ
    साँस लेने का तजरुबा है मुझे
    बहुत सुन्दर कहा है !! अमूमन –लोग ज़िन्दगी से मौत तक के सफर में एक भी साँस पूरी नहीं ले पाते !! गहरी बात कही है दाद !! दाद !!
    एक जां एक तन हैं हिज्र और मैं
    तेरा आना भी अब सज़ा है मुझे
    वाह वाह !!! वाह वाह !! क्या बात कही है !! विप्रलम्भ श्रंगार के ये स्वर पुराने छायावादी गीतों मे महादेवी वर्मा के काव्य में मिलते हैं !!!
    अब मैं ख़ामोश होने वाला हूँ
    क्या कोई शख़्स सुन रहा है मुझे?
    तनहाई की गहराई तटोलने वाली बात है !! खूब !!
    चुप रहा मैं इसी लिये ‘कान्हा’
    मुझसे बेहतर वो जानता है मुझे
    मुहब्बत का एतबार !!
    बहुत अच्छे शेर कहे कान्हा !!! सबसे बडी बात ये है कि बडी आसानी से शेर कहे कहीं सक्ता नहीं ज़ुबान में और कहन में !! जीते रहिये !! शादो आबाद रहिये –मयंक

  5. एक डर सा लगा हुआ है मुझे
    वो बिना शर्त चाहता है मुझे

    खुल के रोने के दिन तमाम हुए
    अब मिरा ज़ब्त देखना है मुझे

    मर रहा हूँ इसी सुकून के साथ
    साँस लेने का तजरुबा है मुझे

    waah…prakhar bhai…har ek sher motiyon ki tarah…poori ghazal lajawab…bahut bahut badhai…

  6. वाह लाज़वाब ग़ज़ल प्रखर साहेब शानदार अशआर
    अब मैं खामोश होने वाला हूँ
    क्या कोई शख्स सुन रहा है मुझे क्या बात है

  7. Dear kanha, apki tareef men apke sare ashaar likhne padenge, Kya ghazal hui hai, Wah

  8. bahot umda ghazal kanha ji….

  9. Bahut umda ghazal hui hai kanha… aur teen chaar sher to Aiae hain bilkul naye hain.. kya kahne pyaare… zindabad

  10. Bohot khoobsurat gazal kahi hai; makta bohot shaandaar kaha hai!!
    Daad kubool farmayein!!

  11. zindabad mere bhai zindabad

    alok

  12. zindabaad prakhar zindabad

    alok

  13. Prakhar bhai kis she’r ko quote karun kise rahne duun….poori gazal hi kamaal hui hae dher sari daad or dheron dher mubarakbaad….
    Pooja

  14. Bahut umda Ghazal wah wah kya kahne SALAMAT RAHIYE

  15. wahh
    waise mohtaram Tufail sb ke comment ke baad …daftare daad band ho jaata hai…
    ajab to nahiN aisa tarhi me aksar hota hai jab misre takra jaate haiN …mere maqte ka misra bhi taqreeban aisa hai…shukr hai ki aaj se do teen roz qabl ghazal irsaal kar chuka huN..hahaha warna badalna padta

  16. सोचता हूँ कि शह्र छोड़ ही दूँ
    यां पे हर शख़्स जानता है मुझे

    मर रहा हूँ इसी सुकून के साथ
    साँस लेने का तजरुबा है मुझे
    Lajawab lajawab lajawab
    Kanha mere bhai
    Dili daad qubul kijiye

  17. ‘कान्हा’ कोई दाद नहीं ,कुछ नहीं कहना फ़ौरन इनआम लेने के लिये आइये। स्वप्निल ये बेटा हमारे चेहरे रौशन करेगा

  18. वाह जनाब कान्हा साहब एक और लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

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