11 टिप्पणियाँ

T-29/24 अपने माज़ी को भूलना है मुझे – समर कबीर

अपने माज़ी को भूलना है मुझे
बैख़ुदी तेरा आसरा है मुझे

ज़िन्दगी के भी कुछ तक़ाज़े हैं
आख़िरत भी सँवारना है मुझे

जानते हो कि टाट हूँ फिर भी
तुमने मख़मल में सी दिया है मुझे

रात जब लेटता हूँ बिस्तर पे
कोई अंदर से मारता है मुझे

शायरी में पयाम देता हूँ
काम रब ने यही दिया है मुझे

तेरे हाथों की इन लकीरों में
अपनी तक़दीर देखना है मुझे

इक ग़लत फ़ैसला लिया था “समर”
आज एहसास हो रहा है मुझे

“समर कबीर”
09753845522

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11 comments on “T-29/24 अपने माज़ी को भूलना है मुझे – समर कबीर

  1. इक ग़लत फ़ैसला लिया था “समर”
    आज एहसास हो रहा है मुझे

    वाह समर साहब … क्या अच्छा शेर कहा है आपने …

    ग़ज़ल बहुत पसंद आई …दाद हाज़िर है

  2. अपने माज़ी को भूलना है मुझे
    बैख़ुदी तेरा आसरा है मुझे
    Dono misre muqammal !! saani misra khud me sab kuchh kah raha hai !! wah !!

    ज़िन्दगी के भी कुछ तक़ाज़े हैं
    आख़िरत भी सँवारना है मुझे
    shb e safar to isi aas par bitani hai
    ajal ke mod ke aage bahut ujala hai -mayank

    जानते हो कि टाट हूँ फिर भी
    तुमने मख़मल में सी दिया है मुझे
    is sher ki novelty appeal kur rahi hai !!

    रात जब लेटता हूँ बिस्तर पे
    कोई अंदर से मारता है मुझे
    jaati hai dhoop ujale paron ko samet ke
    zakhmon ko ab ginoonga main bistar pe let ke –shikeb

    इक ग़लत फ़ैसला लिया था “समर”
    आज एहसास हो रहा है मुझे
    Kya ghalat faisla tha clear nahin hai !! Samar”” takhallus se lagata hai ki patthar fenkane ka faisla tha -!!
    anyway behataren sher kahe hain apane –Mubarak -mayank

  3. जानते हो कि टाट हूँ फिर भी
    तुमने मख़मल में सी दिया है मुझे

    Khoobsurat gazal kahi hai!! Daad kubool farmayein!!

  4. Achchi gazal hui hae Samar Sahab
    Mubarakbaad
    Sadar
    Pooja

  5. वाह जनाब समर साहब अपनी ग़ज़ल में आपने एक बाद एक मोती जड़ दिये बहुत बहुत बधाई आपको

  6. उम्दा ग़ज़ल कही समर भाई, आपकी ग़ज़ल में एक न एक शेर ऐसा होता है जो आपका ही काम होता है। वाह वाह सैकड़ों दाद

    जानते हो कि टाट हूँ फिर भी
    तुमने मख़मल में सी दिया है मुझे

  7. तेरे हाथों की इन लकीरों में
    अपनी तक़दीर देखना है मुझे
    kya kehne..waah

  8. क्या कहने समर कबीर साहब
    बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है

    दिली दाद

    Regards
    Alok mishra

  9. जानते हो कि टाट हूँ फिर भी
    तुमने मख़मल में सी दिया है मुझे

    Waah..kya baat hai…waah

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