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T-29/23 सच को कहने का होसला है मुझे – मोनी गोपाल ‘तपिश’

सच को कहने का होसला है मुझे
अपने अंजाम का पता है मुझे !

उसने रग़बत से हाथ खीँच. लिया
अब कहाँ कोई सोचता है मुझे !

नींद से ख्वाब हो गए रुखसत
ज़िंदगी जैसे इक. सज़ा है मुझे !

दोस्ती का भरम ही तोड़ दिया
इन दिनों जाने क्या हुआ है मुझे !

जिसकी नींदों में ख़्वाब मेरे थे
जब से जागा है ढूंडता है मुझे !

चंद जलते सवाल बुझता दिल
ज़िंदगी तूने क्या दिया है मुझे !

सारे रिश्ते जब उसने तोड़ लिए
मुड़ के अब क्या पुकारता है मुझे !

अब हूँ बुझते दिये सा , सूरज था
इन हवालों को सोचना है मुझे !

क्यूं ”तपिश ” उलझनों में उलझा है
इसके बारे में जानना है मुझे !
‘तपिश ‘

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22 comments on “T-29/23 सच को कहने का होसला है मुझे – मोनी गोपाल ‘तपिश’

  1. चंद जलते सवाल बुझता दिल
    ज़िंदगी तूने क्या दिया है मुझे

    वाह वाह मोनी गोपाल जी …एक अच्छी ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारक़बाद

  2. Bahut pukhta Ghazal !! Jab is zameen par saikadon zaviye talaash kiye ja chuke hain iske baad bhi tazgi bhare sher badi baat hai !! Poori ghazal par Daad -lekin in ash aar par baar baar Daad !! -mayank
    नींद से ख्वाब हो गए रुखसत
    ज़िंदगी जैसे इक. सज़ा है मुझे !

    जिसकी नींदों में ख़्वाब मेरे थे
    जब से जागा है ढूंडता है मुझे !

    चंद जलते सवाल बुझता दिल
    ज़िंदगी तूने क्या दिया है मुझे !

  3. Umda gazal, khoob girah lagaayi hai!!! Daad kubool farmayein..

  4. चंद जलते सवाल बुझता दिल
    ज़िंदगी तूने क्या दिया है मुझे !
    Waah kya kahne tapish sahab…
    Daad haazir hae
    Sadar
    Pooja

  5. umda ….
    zindagi wala sher bahut khoob…wahhh

  6. ताबिश साहब, उम्दा ग़ज़ल ख़यालों की मद्धम आंच में पकी हुई, भरपूर रसीली मगर ये दो शेर क़यामत। सैकड़ों दाद हाज़िर हैं

    नींद से ख्वाब हो गए रुखसत
    ज़िंदगी जैसे इक सज़ा है मुझे

    चंद जलते सवाल बुझता दिल
    ज़िंदगी तूने क्या दिया है मुझे !

    • Mashkoor o mamnoon hoon apki pazirai ka bahut meharbani zarranawazi

    • Chaturvedi sb ye pratikriya apki duaon K liye ki thi tijurba nahin hai so naam lika hi nahi !

      Mashkoor o mamnoon hoon apki pazirai ka bahut meharbani zarranawazi

  7. umdaa ghazal ke liye daad qubule’n Tapish sahab

  8. बहुत उमदा ग़ज़ल हुई है मोनी गोपाल “तपिश”साहब

    दिली दाद

    Regards
    आलोक मिश्रा

  9. सच को कहने का होसला है मुझे
    अपने अंजाम का पता है मुझे !

    क्यूं ”तपिश ” उलझनों में उलझा है
    इसके बारे में जानना है मुझे

    Matle se makte tak …ek mukammal ghazal…behtareen ashaar hain Moni Sahab…Daad kabool karen.

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