32 टिप्पणियाँ

T-29/22 आसमां भी पुकारता है मुझे-सीमा शर्मा मेरठी

आसमां भी पुकारता है मुझे
आशियाँ भी लुभा रहा है मुझे

अक़्स आख़िर कहाँ गया मेरा
आइना क्यों छिपा रहा है मुझे

मुझमें सूरज उगा के चाहत का
वो सवेरा बना गया है मुझे

ग़म की बारिश से बन गयी दरिया
इक समन्दर बुला रहा है मुझे

सुब्ह की सर्द सी फ़िज़ा थी मैं
ग़म का सूरज तपा रहा है मुझे

मेरे अंदर भँवर भी है कोई
तुझसे मिल कर पता चला है मुझे

मैं रिदा हूँ जो बेवफ़ाई की
क्यों मुसलसल तू ओढ़ता है मुझे

ख़ूबसूरत से गुल का पैकर हूँ
“अपने अंजाम का पता है मुझे”

एक ऐसी ग़ज़ल हूँ मैं “सीमा”
हर कोई गुनगुना रहा है मुझे

सीमा शर्मा मेरठी 08171838659

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32 comments on “T-29/22 आसमां भी पुकारता है मुझे-सीमा शर्मा मेरठी

  1. सीमा जी बहुत अच्छे अच्छे शेर पढ़ने को मिले

    वाह … और इस शेर का तो कोई जवाब ही नहीं

    मुझमें सूरज उगा के चाहत का
    वो सवेरा बना गया है मुझे

    क्या कहना ..बहुत मुबारक़बाद

  2. मुझमें सूरज उगा के चाहत का
    वो सवेरा बना गया है मुझे

    मेरे अंदर भँवर भी है कोई
    तुझसे मिल कर पता चला है मुझे

    bahot achche ashaar seema ji… wah

  3. Seema ji… bahut acchi ghazal hui hai.. Matla behad accha hua hai…mayank bhai ke comment me iske saare mumkin pahloo nazar aa rahe hain…
    मुझमें सूरज उगा के चाहत का
    वो सवेरा बना गया है मुझे
    Ye sher bhi khoob pasand aaya.. daad qubulen…

  4. Bohot khoobsura gazal kahi hai aapney! Daad kubool karein!!

  5. Achchi gazal hui hae seema ji.
    Dheron mubarakbaad
    Pooja

  6. bahut khoob…
    matla shandaar
    bhaNwar wala sher lajawaab
    kya baat hai SEEMA JI WAHHH

  7. Ghazal achhi hui hai. Mubarak ho.
    maqta bhi lajawab hai.

  8. सीमा जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही। वाह वाह मगर ये दोनों शेर कलेजा काटने वाले हैं। ढेर सारी दाद

    मुझमें सूरज उगा के चाहत का
    वो सवेरा बना गया है मुझे

    मेरे अंदर भँवर भी है कोई
    तुझसे मिल कर पता चला है मुझे

  9. seema ji gazal ka har ek sher sunder aur peabhavi kis kis ko yahan duhraoon is behtareen gazal ke liye dilse daad sweekaren. bahut bahut badhai.

  10. Wah wah kya kahne SALAMAT RAHIYE bahut umda

  11. मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं – इस कशमकश पर बेहतरीन मतला.

    आसमां भी पुकारता है मुझे
    आशियाँ भी लुभा रहा है मुझे

    वाह वाह सीमाजी.

    शाज़ जहानी

  12. आसमां भी पुकारता है मुझे
    आशियाँ भी लुभा रहा है मुझे
    ज़िन्दगी की पुकार जिस्मानी भी है रूहानी भी !! ज़रूरतें घरेलू भी हैं साँसारिक भी –हमें दुनिया की भी ज़रूरत है और ईश्वर की भी। इस नये शेर पर भरपूर दाद !!
    ग़म की बारिश से बन गयी दरिया
    इक समन्दर बुला रहा है मुझे
    बहुत खूबसूरत शेर है – मुसल्सल ग़मों के बाद जीवन की वरीयतायें बदल जाती हैं –चेतना ईश्वरोन्मुख हो जाती है और हम अपने जीवन की लघुता से निकल कर एक वृहत्तर क्षितिज से जुडना चाहते हैं !!
    मेरे अंदर भँवर भी है कोई
    तुझसे मिल कर पता चला है मुझे
    वाह वाह !! दाद !! बहुत खूब्सूरत शेर कहा है !! ज़िन्दगी मे कोई किरदार –कोई मुलाकात बडा टर्निंग पाइंट साबित होते हैं!
    मैं रिदा हूँ जो बेवफ़ाई की
    क्यों मुसलसल तू ओढ़ता है मुझे
    फिर एक बेहरतीन शेर –गो कि इसका ज़िक्र हज़ार बार किया गया है –लेकिन पुरुष की शाइरी में — दीवाना मुझ सा नहीं इस अम्बर के नीचे
    आगे है कातिल मेरा और मैं उसके पीछे
    फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
    फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

    ख़ूबसूरत से गुल का पैकर हूँ
    “अपने अंजाम का पता है मुझे”
    अच्छी गिरह !! अजकल गुलचीं बहुत हैं और फिज़ाओं में आँधियाँ हैं इसलिये गुल के पैकर के लिये सलामती मुश्किल है !!
    एक ऐसी ग़ज़ल हूँ मैं “सीमा”
    हर कोई गुनगुना रहा है मुझे
    सीमा साहबा !! इस ग़ज़ल के लिये पूरी दाद !! बहुत अच्छे शेर कहे हैं –मयंक

    • मयंक साहेब ग़ज़ल का बहुत खूबसूरत विश्लेषण किया आपने इतना कीमती समय दिया आपकी बहुत बहुत शुकगुज़ार हूँ मयंक जी एक वास्तविकता मेरे ज़ह्ण की कशमकश है ये मतला हम क्या कह सकते हैं कुछ चीज़े खुद ब खुद लफ़्ज़ों के ज़रिये बयाँ हो जाती हैं आभारी हूँ आपकी

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