31 टिप्पणियाँ

T-29/21 रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे – नवीन

रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे।
यानि अब तक भुला रहा है मुझे॥

वो भी तो वक़्त का सताया है।
फिर भला क्यों सता रहा है मुझे॥

अब रिहाई बहुत ज़ुरूरी है।
कोई आवाज़ दे रहा है मुझे॥

ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
कौन साहिल प लिख रहा है मुझे॥

दिन-ब-दिन दर्द में इज़ाफ़ा है।
चैन मिलता ही जा रहा है मुझे॥

कारोबारे-चमन उरूज प है।
ग़म गटकता ही जा रहा है मुझे॥

इश्क़ जैसा चतुर नहीं कोई।
मुफ़्त-रुज़गार दे गया है मुझे॥

दिन ख़सारों के लद चुके साहब।
अब तो हर नुक़्स में नफ़ा है मुझे॥

मेरे नक़्क़ाद2 ऐ मेरे भगवान।
जो मिला आप से मिला है मुझे॥

रात बरसाये धूप को शायद।
दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥

उस की महफ़िल मकानो-घर के सिवा।
उस का बाज़ार भी पता है मुझे॥

यों ही खारा नहीं बना हूँ मैं।
तज़्रिबों ने बहुत चखा है मुझे॥

सब के अन्दर ख़ुदा का मन्दर है।
उफ़ ये कैसा मुग़ालता3 है मुझे॥

कोई अम्बर भले रहे मग़रूर।
कोई ज़र्रा तो पा चुका है मुझे॥

इक ‘नवीन’ आसमान और भी है।
इक सुराग़ और मिल गया है मुझे॥

तरह की गिरह का शेर:-
मैं हूँ रघुपति-सहाय का वारिस।
“अपने अञ्ज़ाम का पता है मुझे”॥

1 स्पर्श 2 आलोचक / टीकाकार 3 ग़लत-फ़ह्मी

नवीन सी॰ चतुर्वेदी
9967024593

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31 comments on “T-29/21 रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे – नवीन

  1. ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
    कौन साहिल प लिख रहा है मुझे॥

    अच्छी ग़ज़ल हुई है नवीन भाई ..वाह वाह…बहुत मुबारक़बाद

  2. Naveen bhai, khoob gazal kahi hai!! Daad kubool farmayein!

  3. AAP KA ANDAAZ…AAP KA TEVAR
    AAP KI PEHCHAN AAP KI SHINAKHT
    HAR SHER MEn
    itne sher
    itne mafhoom
    itni baateN
    KIS KIS KA ZIKR KARUn
    raat me dhoop wala sher kghususi taur se daad ka mustahaq

  4. शानदार अशार कहे हैं नवीन भाई!! दाद क़ुबूल फरमाएं

    #आसिफ़ अमान

  5. नवीन अपने स्वाभाविक मूड से अलग ग़ज़ल कही। वाह वाह, ये दोनों शेर बहुत ख़ूबसूरत हुए। सैकड़ों दाद

    अब रिहाई बहुत ज़ुरूरी है।
    कोई आवाज़ दे रहा है मुझे॥

    ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
    कौन साहिल प लिख रहा है मुझे॥

  6. रात बरसाये धूप को शायद।
    दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥
    waah waah waah

  7. जनाब नवीन सी. चतुर्वेदी जी आदाब,बहुत अच्छे अशआर निकाले आपने इस ज़मीन में,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

    -समर कबीर

  8. Din khasaron ke lad gaye sahab
    Ab to har nuks me nafa hai mujhe.
    waah kya kahna.

  9. रोज़ रह-रह के सोचता है मुझे।
    यानि अब तक भुला रहा है मुझे॥
    क्या बात है !! वाह वाह !! बहुत सुन्दर नवीन भाई !! मैने किसी को बीस बरस पहले बीस हज़ार रूपये दिये थे, उधार !! उसकी याद आ गई ये शेर पढ कर !!!
    वो भी तो वक़्त का सताया है।
    फिर भला क्यों सता रहा है मुझे॥
    खुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सबमें
    यूँ ही कुछ रोज़ ज़माने को सताया जाये –निदा फाज़ली
    अब रिहाई बहुत ज़ुरूरी है।
    वही आवाज़ दे रहा है मुझे॥
    तोड दे शायद अनासिर का कफस
    रूह में अब कुव्वते परवाज़ है –मयंक
    ये तरावट ये लम्स1 अदभुत है।
    कोई साहिल प लिख रहा है मुझे॥
    किनारे पर नहीं , ऐ दोस्त!! वो खुद ही किनारा है
    उसे छूने की कोशिश में समन्दर टूट जाता है –मयंक
    रात बरसाये धूप को शायद।
    दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥
    वाह वाह वाह वाह !! क्या शेर कहा है !!! दाद दाद दाद !!!
    उस की महफ़िल मकानो-घर के सिवा।
    उस का बाज़ार भी पता है मुझे॥
    बडी बारीक बडी महीन बात है –दरअस्ल उसके महफिल मकानो-घर सब उसके बाज़ार की ही एक्स्टेण्डेड आर्म्स हैं !! वो जज़बात बेच कर अक़ीदत खरीदता है !!
    यों ही खारा नहीं बना हूँ मैं।
    तज़्रिबों ने बहुत चखा है मुझे॥
    बेहतरीन शेर कहा है !! कमाल है !! वाह वाह !!
    सब के अन्दर ख़ुदा का मन्दर है।
    उफ़ ये कैसा मुग़ालता3 है मुझे॥
    ख़ुदा का मन्दर नहीं भैया ख़ुदा की मस्जिद !! महौल देख कर बात करो !! किसी की धार्मिक भावना को ठेस लग गई तो !!!!!!!!!!!!!!! वो दिन गये जब ये शेर प्रास्ंगिक था –
    हम तो तेरा दर समझ कर झुक गये
    अब खुदा जाने कि वो काबा था या बुतखाना था
    इक ‘नवीन’ आसमान और भी है।
    इक सुराग़ और मिल गया है मुझे॥
    बिल्कुल !! सितारों के आगे जहाँ और भी हैं !! आओ बैठें तख़्य्युल पर और उड चलें वहीं !! कोई हमें रोक नहीं सकता !!!
    तरह की गिरह का शेर:-
    मैं हूँ रघुपति-सहाय का वारिस।
    “अपने अञ्ज़ाम का पता है मुझे”॥
    भाई !! जिनका नाम लिया वो तो कांग्रेस के महासचिव थे !!अपनी सियासी जल्वागाह के चलते उन्होने किसी पर थूक भी दिया तो उसे चाशनी बता कर अगला खा लेता था!! रंगबाज़ थे अपने दौर के वो !! लेकिन जब यही सियासी छाता सर से हट जाता है तो अपने दौर का आफताब भी जुगनू बन जाता है – जब कांग्रेस का दामन छोडा था तब आई सी यू में भर्ती एक सुपरस्टार को इंकम टैक्स का नोटिस दिया गया था तब उसने मालूम है क्या शेर कहा था पढो !! मैं हूँ हरिवंशराय का वारिस।
    “अपने अञ्ज़ाम का पता है मुझे”॥
    तब से आज तक कभी सपा कभी भाजपा की शरण में हैं बिचारे !!
    बहरहाल चुहुल अपनी जगह !! बहुत शानदार ग़ज़ल कही है इस ज़मीन पर !!—मयंक

  10. रात बरसाये धूप को शायद

    क्या कहने बहुत उम्दा
    Regards
    आलोक

  11. रात बरसाये धूप को शायद।
    दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे

    Kya kahne… bahut uMDA sher hai… waah

  12. रात बरसाये धूप को शायद।
    दिन तो तारे दिखा चुका है मुझे॥

    lajawab Ghazal Naviiin Bhai…Jiyo

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