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T-29/20 वक़्त ने जब से पा लिया है मुझे – शफ़ीक़ रायपुरी

वक़्त ने जब से पा लिया है मुझे।
हर घड़ी आज़मा रहा है मुझे॥

ताजे-शुहरत अगर मिला है मुझे।
मेरे उस्ताज़ की दुआ है मुझे॥

दश्ते-तनहाई में ख़ुदा जाने।
कौन है जो पुकारता है मुझे॥

हक़-बयानी प मारा जाऊँगा।
“अपने अञ्ज़ाम का पता है मुझे”॥

मैं सदाक़त से फिर नहीं सकता।
कोई अन्दर से टोकता है मुझे॥

मैं भी उस के ख़याल में गुम हूँ।
वो भी दिन रात सोचता है मुझे॥

कितनी पाकीज़गी टपकती है।
उस के माथे को चूमना है मुझे॥

टूटे दिल जोड़ने की कोशिश में।
ये तो तय है की टूटना है मुझे॥

उस की आँखों में अब नहीं पानी।
उस ने एक बार रो लिया है मुझे॥

क्यों कहीं जा के हाथ फैलाऊँ।
मेरा रब है – नवाज़ता है मुझे॥

मैं ने ग़म खाये हैं ‘शफ़ीक़’ बहुत।
आज ग़म” है – कि खा रहा है मुझे॥

शफ़ीक़ रायपुरी
9406078694

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23 comments on “T-29/20 वक़्त ने जब से पा लिया है मुझे – शफ़ीक़ रायपुरी

  1. मैं सदाक़त से फिर नहीं सकता।
    कोई अन्दर से टोकता है मुझे

    क्या शेर कहा है साहब …वाह वाह वाह

    टूटे दिल जोड़ने की कोशिश में।
    ये तो तय है की टूटना है मुझे॥

    उस की आँखों में अब नहीं पानी
    उस ने एक बार रो लिया है मुझे

    कमाल की ग़ज़ल हुई है शफ़ीक़ जी … एक एक शेर की आवाज़ बुलंद है …वाह वाह …बहुत मुबारक़बाद

  2. वक़्त ने जब से पा लिया है मुझे।
    हर घड़ी आज़मा रहा है मुझे॥

    टूटे दिल जोड़ने की कोशिश में।
    ये तो तय था कि टूटना है मुझे॥

    achchi ghazal shafeeq saheb… pyari ghazal… wah

  3. Shafeeq Sahab, behtareen gazal huyi hai! Khaas daad; yeh sher bohot umda kahe hai

    टूटे दिल जोड़ने की कोशिश में।
    ये तो तय है की टूटना है मुझे॥

    उस की आँखों में अब नहीं पानी।
    उस ने एक बार रो लिया है मुझे॥

  4. umda ashaar
    barjasta ashaar
    bharpoor ghazal
    \wahhhh

  5. हाय, काश ऐसा शेर, बस एक ही ऐसा शेर मैं कह पाऊं तो ख़ुद को कामयाब शायर मान लूंगा। ये वही मक़ाम है जब हज़रते-ग़ालिब ने हज़रते-मोमिन से कहा ”अपना ये शेर मुझे दे दो और मेरा पूरा दीवान मुझसे ले लो”। लाखों दाद, बंदगी क़ुबूल फ़रमाइये

    उस की आँखों में अब नहीं पानी
    उस ने एक बार रो लिया है मुझे

    • Muhtaram Tufail sahab aap ne sher par aisi Daad pesh kar di hai jis ke liye SHUKRIYA lafz Bahut chhota lag raha hai… Daad-o-tahseen ke liye saraapa Sipaas…..

  6. वक़्त ने जब से पा लिया है मुझे।
    हर घडी आज़मा रहा है मुझे॥
    समय एक एंटिटी है इसके असीर बातिल हैं और जिस्का इस पर इख़्तियार है वो ज़ाविदाँ है। ये हम पढ कर और सुंकर कहते हैं लेकिन जो आगही की सरहद तक गये हैं उन्होने इस विचार की पुष्टि की है !! मतले पर दाद !!
    दश्ते-तनहाई में ख़ुदा जाने।
    कौन है जो पुकारता है मुझे॥
    हम जिस्म नहीं है !! अपना बाकी वज़ूद बदन के बाहर रहता है –वही पुकरता है –दश्ते तनहाई में दुनिया का शोर नहीं –इसलिये हम इस अवाज़ को महसूस कर लेते हैं – अच्छा शेर कहा है !!
    हक़-बयानी प मारा जाऊँगा।
    “अपने अञ्ज़ाम का पता है मुझे”॥
    मंसूर हों या सुकरात ये बात सच है तस्लीम !!!
    मैं सदाक़त से फिर नहीं सकता।
    कोई अन्दर से टोकता है मुझे॥
    जागे हुये ज़मीर के लिये दाद !!
    मैं भी उस के ख़याल में गुम हूँ।
    वो भी दिन रात सोचता है मुझे॥
    पहला मिसरा तो विश्वास का मिसरा है दूसरा आशा का मिसरा है !!
    कितनी पाकीज़गी टपकती है।
    उस के माथे को चूमना है मुझे॥
    चाँद मेहराब पे सोई हुई इक आयत है
    बेवज़ू आँखें हैं छूते हुये डर लगता है –बशीर बद्र
    उस की आँखों में अब नहीं पानी।
    उस ने एक बार रो लिया है मुझे॥
    ये मोती गिरने के बाद उठाये नहीं जा सकते –एक शेर — ”मयंक” आँख में सैलाब उठ न पाये कभी
    कि एक अश्क़ मुसाफिर है इस सफीने का –मयंक
    मैं ने ग़म खाये हैं ‘शफ़ीक़’ बहुत।
    आज ग़म” है – कि खा रहा है मुझे॥
    अच्छा मक़्ता !! शफ़ीक़ साहब !! हमेशा की तरह बेहतरीन शेर कहे !! मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये –मयंक

    • Mayank sahab hamesha ki Tarah sanjeeda aur Be-gharaz daad…. saraapa Mamnoon hun, Bahut Bahut shukriya

  7. मैं ने ग़म खाये हैं ‘शफ़ीक़’ बहुत।
    आज ग़म” है – कि खा रहा है मुझे॥ Shafique saheb, ustadana kalam k liye mubarakbad, Wah khoob

  8. Bahut khubsurat gazal hui sir
    Dili daad qubul kijiye
    Sadar
    Imran

  9. क्या कहने शफ़ीक़ साहब
    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है
    दिली दाद क़ुबूल करें

    Regards
    आलोक मिश्रा

  10. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल

  11. Lajawab ghazal hai shafique bhai.
    mera rab hai….
    aur maqte ka kya kahna.waah.

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