18 टिप्पणियाँ

T-29/19 ख़ुश्बुओं ने उठा लिया है मुझे – गौतम राजरिशी

ख़ुश्बुओं ने उठा लिया है मुझे
गिरा रूमाल इक मिला है मुझे

चुप खड़ी रह गई है साँस मेरी
उसने नज़रों से कस लिया है मुझे

बस तुम्हें ? बस तुम्हें ही सोचूँ मैं ?
इश्क़ इतना नहीं हुआ है मुझे

हँस पड़ी है मेरी उदासी भी
तुमने मिस-काॅल जो दिया है मुझे

ताक पर से वो कार्ड शादी का
रात भर रोज़ घूरता है मुझे

चाहूँ रहना सजा-धजा हरदम
ऐसे कैसे वो देखता है मुझे ?

ओह ! सिगरेट तो फ़रेब है बस
अस्ल में, तेरा ही नशा है मुझे

ओय ‘गौतम’ ! वो तुझ पे मरती है
हाँ, पता है ! अरे, पता है मुझे !

गौतम राजरिशी
09759479500

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18 comments on “T-29/19 ख़ुश्बुओं ने उठा लिया है मुझे – गौतम राजरिशी

  1. आपका फैन मैं लम्बे समय से हूँ सर।
    और हमेशा आपकी ग़ज़लों का नशा बढ़ता रहता है।

    बस तुम्हें ? बस तुम्हें ही सोचूँ मैं ?
    इश्क़ इतना नहीं हुआ है मुझे

    हँस पड़ी है मेरी उदासी भी
    तुमने मिस-काॅल जो दिया है मुझे

    मज़ा आ गया

  2. ज़हर
    जान निकाल के हाथ पे रख दी।
    आख़िरी शेर पे तो हाय…क्या कहूँ

  3. वाह वाह.. अंकित भाई ने सुनाई थी ये ग़ज़ल सो इन्तजार था..
    बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है भैया !!

  4. हँस पड़ी है मेरी उदासी भी
    तुमने मिस-काॅल जो दिया है मुझे

    हाय…क्या मंज़र बाँधा है भैय्या

    मज़े की ग़ज़ल हुई है …सारे शेर पसंद आये …

  5. aap ka apna andaaz
    har sher me N Prayog
    tajreba
    bahut khoob

  6. ताक पर से वो कार्ड शादी का
    रात भर रोज़ घूरता है मुझे

    waah dada….kya khoob….har ek sher me aapke dastkhat milte hain….lajawab…

  7. कौन सोचे ग़ज़ल हुई या नज़्म
    दिलजले ने सुना दिया है मुझे !

    हम मुग्ध हैं, गौतम भाई !
    :-))

  8. Behtareen gazal ke liye Mubarakbaad Gautam Sahab!!

  9. bilkul alag flavour /juda rang /purasar aur nihayat khoobsoorat gazal
    waahh waahh
    dili daad

    sadar
    alok

  10. गौतम की ग़ज़ल…….. हमेशा की तरह अपने ख़ास रंग में डूबी हुई, ख़ास बौछार में नहाई हुई ग़ज़ल। गुनगुनी धूप में जैसे वादियां अपने बदन से रात की ओस उतारें और ये कुहरे का हल्का-हल्का धुआँ उड़ने लगे। ये मर्तबा बड़ी मुश्किल से मिलता है कि किसी के शेर उसके नाम से पहचाने जायें। वाह वाह, ज़िंदाबाद

  11. गौतम राजरिशी भाई !! आपकी ग़ज़ल आपका नाम न भी हो तो भी पहचान लूँगा !! एक खास फ्लेवर होता है आपके अश आर में !!
    ख़ुश्बुओं ने उठा लिया है मुझे
    गिरा रूमाल इक मिला है मुझे
    क्या बात है !! क्या गुलाबी रंग है !! एक बहुत पुराना गीत है मालूम नहीं आपने सुना है कि नहीं –
    कानपूर के माल रोड पे इक लडकी था जाई ला
    उसका गिरा रूमाइला
    हमने लिया उठाइला
    लारी लप्पा लारी लप्पा लारी लप्पा दा !!
    चुप खड़ी रह गई है साँस मेरी
    उसने नज़रों से कस लिया है मुझे
    वाह वाह !! क्षण बाँध लिया आपने अल्फाज़ से !! ये कुव्वते –गोयाई है !! बहुत खूब !!
    हँस पड़ी है मेरी उदासी भी
    तुमने मिस-कॉल जो दिया है मुझे
    कभी अकेले में आकर झिंझोड दूंगा तुझे
    जहाँ जहाँ से तू टूटा है जोड दूँगा तुझे –राहत
    ताक पर से वो कार्ड शादी का
    रात भर रोज़ घूरता है मुझे
    क्या बात है भाई !! क्या बात है !!
    एक शेर दाग़ का क्वोट कर रहा हूँ — खुशी मर्गे-अदू की सौ ग़मों से हो गई बदतर
    मेरी आँखों ने देखा है किसी को सोगवारों में –दाग़ देहलवी
    ओह ! सिगरेट तो फ़रेब है बस
    अस्ल में, तेरा ही नशा है मुझे
    ये इल्म के शिकवे ये रिसले ये किताबें
    इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं –जानिसार
    ओय ‘गौतम’ ! वो तुझ पे मरती है
    हाँ, पता है ! अरे, पता है मुझे !
    गलतफहमी का इलाज हो शायद !! खुश्फहमी का कोई इलाज नही!!  
    गौतम भाई !!! बहुत खूब !! बहुत खूब !!! क्या ग़ज़ल कही है !! वाह वाह !! –मयंक

  12. गौतम जी
    बेहद उम्दा ग़ज़ल हुई है।
    मतला और मक़्ता के तो क्या ही कहने।
    ढेरों दाद हाज़िर है क़ुबूल कीजिये
    सादर
    पूजा

  13. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है गौतम भाई

    दिली दाद

    आलोक

  14. bahut umda ghazal hai gautam bhai… aur Maqta to jaanleva hai.. kya kahne…

  15. Gautam ke rang men rangi poori ki poori Gautamiyan Ghazal…Jiyo Col…din bana diya .

    • बहुत दिनों बाद इधर आया, शायद आपकी ग़ज़ल ने पुकार लिया। ग़ज़ल क्या है एक भूली हुई सी याद के मजरों से गुजरते हुए बार बार ठिठकना है। आप शायर लोग भी न! कहाँ कहाँ ले जाते हो ऊँगली पकड़ के। यूं ही अलमस्त मिजाज़ रखे चलो।

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