26 टिप्पणियाँ

T-29/15 ज़िन्दगी बस तिरा नशा है मुझे-सौरभ शेखर

ज़िन्दगी बस तिरा नशा है मुझे
मयकशी-वयकशी से क्या है मुझे

हिचकियाँ आ रही हैं पहरों से
याद ये कौन कर रहा है मुझे

पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
कितना कुछ और देखना है मुझे

घर में फुर्सत का आज इक लम्हा
इत्तिफाकन गिरा मिला है मुझे

मैं जो मर भी गया तो क्या होगा
शह्र में कौन जानता है मुझे

फ़ेसबुक से झगड़ रहा हूँ मैं
‘अपने अंज़ाम का पता है मुझे.’

सौरभ शेखर 09873866653

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26 comments on “T-29/15 ज़िन्दगी बस तिरा नशा है मुझे-सौरभ शेखर

  1. ज़िन्दगी बस तिरा नशा है मुझे
    मयकशी-वयकशी से क्या है मुझे

    पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

    क्या ही अच्छा मतला हुआ है सौरभ भैय्या वाह वाह …मेरे तो पसीने छूट गए थे मतला साधते साधते

    शानदार ग़ज़ल… हमेशा की तरह

  2. bahut umda ghzal huyi hai
    pyare pyare sher
    wahh wahhh

  3. Matlaa bohot khoob kaha hai!! Daad kubool karein!!

  4. पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

    मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
    कितना कुछ और देखना है मुझे

    kya kahne bhaiya waahh waahh

    saikadon daad

    alok

  5. वाह सौरभ जी, क्या बढ़िया शेर कहे हैं..
    और यहाँ तो क्या खूब कहा है –

    मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
    कितना कुछ और देखना है मुझे |

  6. अहा कितनी ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है ….
    हर शेर कमाल है, और ये दो नगीने बेजोड़ “पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा” और “मुझको आँखें बचा के रखनी हैं” .

    ढेरों दाद

  7. पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

    मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
    कितना कुछ और देखना है मुझे

    घर में फुर्सत का आज इक लम्हा
    इत्तिफाकन गिरा मिला है मुझे

    Bahut umda ghazal hai saurabh bhai… Aur ye teen sher to bas…kya kahne.. Zindabaad…

  8. मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
    कितना कुछ और देखना है मुझे

    घर में फुर्सत का आज इक लम्हा
    इत्तिफाकन गिरा मिला है मुझे
    Wahhhhhhh
    Bahut achi ghazal hui sir
    Dili daad qubul kijiye
    Regards
    Imran

  9. Paak logo ki suhbaten tauba
    Kufra hi kufra sujhta hai mujhe.
    Saurabh Sahab kya hi umda sher kaha hai.

  10. नई गिरह !!! गजल पर बधाई !!! –मयंक
    ज़िन्दगी बस तिरा नशा है मुझे
    मयकशी-वयकशी से क्या है मुझे
    बहुत खूब !! ज़बान का शेर कहा है सौरभ !!
    पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे
    खूब तंज़ है –प्रासंगिक भी है !!
    मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
    कितना कुछ और देखना है मुझे
    बहुत खूब !! जो देखा है उससे आंखे बचनी मुश्किल है !!

    फ़ेसबुक से झगड़ रहा हूँ मैं
    ‘अपने अंज़ाम का पता है मुझे.’
    नई गिरह और नया शेर कहा है !!
    सौरभ भाई !! हमेशा की तरह अच्छी गजल –मुबारकबाद !! –मयंक

  11. main jo mar bhi gaya to kya hoga + shahr men kaun janta hai mujhe.
    umda ghazal k liye mubarakbad

  12. सौरभ साहब
    बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है। पर जो आधुनिक गिरह आपने लगायी है वो अनायास ही चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
    ढेरों दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

  13. kya achcha sher kah diya hai saurabh ji aapne… wah wah wah
    पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

  14. पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे
    Kya kehne..bahut umdaa bhaiya

  15. पाक लोगों की सुहबतें तौबा
    कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे

    पूरी ग़ज़ल चुस्त, कसी हुई है मगर एक शेर क़यामत का है। क्या ही अच्छा, क्या ही सच्चा शेर हुआ। ज़िंदाबाद इसी रविश पर कायम रहिये और कुफ़्र फैलते रहिये। इस सिलसिले का मेरा भी एक मतला है।

    कुफ़्र का सिलसिला ही दीन हुआ
    ज़िन्दगी का सफ़र हसीन हुआ

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