24 टिप्पणियाँ

T-29/12 कब कोई शख़्स जानता है मुझे-पवन कुमार

कब कोई शख़्स जानता है मुझे
फिर भी दुनिया से साबक़ा है मुझे

अपने आगाज़ का पता ही नहीं
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’

एक आवाजे़-बाज़गश्त हूँ मैं
आपने क्या कभी सुना है मुझे

जिसको मैंने दुआएँ दी बरसों
ये सुना है वो कोसता है मुझे

कोई तस्वीर ही नहीं मेरी
जाने किस रंग से भरा है मुझे

कैसे दे दूँ जो मेरे पास नहीं
आज वो मुझसे मांगता है मुझे

साँस में साँस आज आई है
तेरे अहसास ने छुआ है मुझे

बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे

फिर नए मौसमों की चाहत है
इन ख़िज़ाओं का तजरिबा है मुझे

तह पे तह और चढ़ती जाती है
जैसे जैसे वो खोलता है मुझे

पीठ पर आँख अब भी चुभती है
यानी अब तक वो देखता है मुझे

पवन कुमार 09412290079

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

24 comments on “T-29/12 कब कोई शख़्स जानता है मुझे-पवन कुमार

  1. एक आवाजे़-बाज़गश्त हूँ मैं
    आपने क्या कभी सुना है मुझे

    फिर नए मौसमों की चाहत है
    इन ख़िज़ाओं का तजरिबा है मुझे

    बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
    किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे

    वाह वाह ….क्या अच्छे शेर हुए हैं …. बहुत बहुत मुबारक़बाद पवन जी

  2. बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
    किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे

    Subhal Allah…Lajawab Ghazal kahi hai Bhai…waah waah…Bharpoor daad kaboolen.

  3. Kya kahne sir kya kahne
    bahot umda

    sadar
    Alok

  4. KHOOBSURAT ASHAAR SE MOZAYYAN BHARPOOR GHAZAL
    DAAD HI DAAD

  5. कोई तस्वीर ही नहीं मेरी
    जाने किस रंग से भरा है मुझे

    Pawan bhai….kya sher kaha hai! Poori gazal bohot umda huyi hai! Dhero daad kubool farmayein!

  6. एक आवाजे़-बाज़गश्त हूँ मैं
    आपने क्या कभी सुना है मुझे

    बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
    किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे

    kya kahne kya kahne… kya hi acche sher hue hain pawan ji…zindabaad

  7. क्या शानदार ग़ज़ल हुई है …. वाह वाह

    इन दो शेरों ने कहर ढा दिया, “बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से…” और “पीठ पर आँख अब भी चुभती है” .
    बधाइयाँ

  8. पीठ पर आँख अब भी चुभती है
    यानी अब तक वो देखता है मुझे
    WAAAAAAAAAAAAAAh

  9. पवन साहब
    बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

  10. कब कोई शख़्स जानता है मुझे
    फिर भी दुनिया से साबक़ा है मुझे
    बडा ही दर्शनिक प्रश्न है !! कोई किसी को नही जानता –मैं खुद को ही नहीं जानता – मनुष्य नाम की जो जैविक चेतना कुद्रत ने बनाई है इसका 3% भी अभी जाना नहीं गया –स्थूल देह का पिण्ड –मन -बुद्धि – अहंकार फिर अवचेतन या सार्वभौम आत्मा – हमारे अस्तित्व के इतने धरातल हैं हम इंको कितना जानते हैं ??! कोई ईश्वरीय महायज्ञ है जिनमे हम समिधा बन कर होम किये जाते हैं बनाने वाले की लीला है !!! फिर भी उसकी दुनिया उसकी निर्मिति है और हम को दुनिया से साबका रखना ही होता है पने लिये नही तो भी लोकप्रतिष्ठा के लिये !!! मतले के तस्व्वुफ पर दाद !!!!
    एक आवाजे़-बाज़गश्त हूँ मैं
    आपने क्या कभी सुना है मुझे
    ये आसमान से टूटा हुआ सितारा है // कि दश्ते शब मे भटकती हुई सदा है कोई –शिकेब
    जिसको मैंने दुआएँ दी बरसों
    ये सुना है वो कोसता है मुझे
    ये भी ज़िन्दगी का कडुवा सच है –नई नस्ले पितृत्व को आजकल ऐसे ही यथेष्ट नही लेकिन यथा अपेक्षित गरिमा देती हैं !! If you feed a dog it,ll nat bite you !! this is the difference between a dog and a man !!!
    कोई तस्वीर ही नहीं मेरी
    जाने किस रंग से भरा है मुझे
    अच्छा शेर कहा है !! ज़िन्दगी मे बेशतर लोगों का किरदार मुकम्मल नहीं होता –उनका प्रतिनिधित्व करता है ये शेर !!!
    कैसे दे दूँ जो मेरे पास नहीं
    आज वो मुझसे मांगता है मुझे
    मुझे दिल की खता पर “यास” शर्माना नहीं आता
    पराया जुर्म अपने नाम करवाना नही आता –यास यगाना चंगेज़ी
    बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
    किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे
    हासिले गज़ल शेर है अपने शिल्प के कारण !!!
    तह पे तह और चढ़ती जाती है
    जैसे जैसे वो खोलता है मुझे
    वाह वाह !!!
    पीठ पर आँख अब भी चुभती है
    यानी अब तक वो देखता है मुझे
    पीथ पर आँख का चुभना एक नया ख्याल है इसके लिये दाद !!!
    पवन साहब !! खूबसूरत शेर कहे !! बहुत बहुत बधाई –मयंक

  11. Peeth par aankh ab bhi chubhti hai
    Yaani ab tak wo dekhta hai mujhe

    Waah waah Bahut khoob Pawan sahab dhero’N Daad ….

  12. waah..bahut umdaa ghazal hui hai bhaiya
    फिर नए मौसमों की चाहत है
    इन ख़िज़ाओं का तजरिबा है मुझे

    तह पे तह और चढ़ती जाती है
    जैसे जैसे वो खोलता है मुझे

    पीठ पर आँख अब भी चुभती है
    यानी अब तक वो देखता है मुझे
    kya kehne..dili daad
    Kanha

  13. यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही बेहद उम्दा हुई है मगर इस शेर और बिलकुल नये क़ाफ़िये ने मज़ा दोहरा कर दिया। वाह वाह सैकड़ों दाद

    बेसमर हूँ मैं एक मुद्दत से
    किसलिए अब झिंझोड़ता है मुझे

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: