35 टिप्पणियाँ

T-29/11 लानतें बाप की, दुआ मां की- मयंक अवस्थी

बस सितारों का आसरा है मुझे
देने वाले ने ये दिया है मुझे

क्या कहूं तेरे शाहकारों को
तेरा पत्थर भी देवता है मुझे

मेरे दरिया !! तेरा हुबाब हूं मैं
“अपने अंजाम का पता है मुझे”

जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
कोई चुपचाप देखता है मुझे

लानतें बाप की, दुआ मां की
कितने रंगों मे रब मिला है मुझे

एक शोला हूँ बहते पानी पर
हर नफस लम्स ए कज़ा है मुझे

मयंक अवस्थी (8765213905)

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35 comments on “T-29/11 लानतें बाप की, दुआ मां की- मयंक अवस्थी

  1. एक शोला हूँ बहते पानी पर
    हर नफस लम्स ए कज़ा है मुझे

    क्या अच्छी ग़ज़ल हुई है मयंक जी … हर शेर लाजवाब…वाह…

  2. Mayank ji..bohot khoobsurat gazal aur girah bhi kya khoo lagayi…
    “Mere dariya! tera hubaab hu main”

  3. kya kahne bhaiya
    bahut umdah gazal hui hai
    dili mubrakabad

    sadar
    Alok

  4. इस शेर ने दिन बना दिया, “जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ / कोई चुपचाप देखता है मुझे” .
    दाद हाज़िर है।

  5. जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे
    Mayank saheb, ye shair kah kar apko kitna anand aya hoga aur kitna philosophical shair kaha hai. mubarakbad qubool farmayen

  6. बहुत उम्दा गिरह के साथ अच्छी ग़ज़ल……. इस शिकवे के साथ

    कई तरही ख़मोश बीत गईं
    मुद्दतों बाद तू मिला है मुझे

  7. Kaafi dino baad aapki koi ghazal padhi aur hamesha ki tarah lutf andoz hua. Daad haazir hai.

  8. जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे

    सारी ग़ज़ल बहुत उम्‍दा है आ. भाई साहब, लेकिन ये शे’र लूट गया मुझे।

    वाह…वाह…वाह…।

    सादर
    नवनीत

  9. जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे
    Bahut pyari ghazal hui sir
    Dili daad qubul kijiye

  10. जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे
    kya kahne bhaiya.. bahut accha she’r hua hai…

  11. Jab k chhup kar gunaah karta hun
    Koi chup chaap dekhta hai mujhe

    Waah waah Mayank sahab kya kahne, Group men Bahut dino k baad waapsi jaandaar Ghazal k saath , GIrah ki bhi Daad qabool Karen……

  12. Bhai
    pranaam
    Bahut umda gahzal hai. Is sher par daad hazir hai….
    एक शोला हूँ बहते पानी पर
    हर नफस लम्स ए कज़ा है मुझे
    Waah umda.

  13. जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे
    वाह… क्या कहने दादा…
    दाद हाज़िर है
    सादर
    पूजा

  14. लानतें बाप की, दुआ मां की
    कितने रंगों मे रब मिला है मुझे

    ZINDABAAD Mayank Bhai…waah waah waah…jiyo

  15. बाप की, दुआ मां की
    कितने रंगों मे रब मिला है मुझे

    वाह, शानदार ।

  16. behad umdaa ghazal hui hai bhaiya
    क्या कहूं तेरे शाहकारों को
    तेरा पत्थर भी देवता है मुझे

    मेरे दरिया !! तेरा हुबाब हूं मैं
    “अपने अंजाम का पता है मुझे”

    जबकि छुपकर गुनाह करता हूँ
    कोई चुपचाप देखता है मुझे
    kya hi kehne..shandar

  17. इस ग़ज़ल के अश’आर जिस भोलेपन से बोलते हुए सामने आये हैं, मयंक भाईजी, कि दिल बार-बार शेर-दर-शेर झूम रहा है.
    एक बहुत ही अच्छे इन्सान की तरफ़ से एक बहुत ही अच्छी ग़ज़ल !
    दाद दाद दाद !

    -सौरभ पाण्डेय
    नैनी, इलाहाबाद.

    • सौरभ साहब !! आप जैसे साहित्यकार और साहित्य मर्मज्ञ से ऐसी सकारात्मक टिप्प्णी मुझे एक विधायक ऊर्जा से भर देती है !! बहुत हौसला मिलता है मुझे आपके शब्दों से – हार्दिक आभार –सादर –मयंक

  18. क्या कहूं तेरे शाहकारों को
    तेरा पत्थर भी देवता है मुझे
    kya achcha sher kaha hai aapne.. kya hamd ka sher bhai… wah wah wah…

    मेरे दरिया !! तेरा हुबाब हूं मैं
    “अपने अंजाम का पता है मुझे”
    wah wah wah… pata hone ko kitni khoobsoorti se nibhaya hai aapne… behtereen girah mayank sahab… zindabaad…

  19. वाह वाआआआह् शानदार मयंक साहेब

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