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है अनोखा समाँ ज़ेह्न के दरमियाँ आग जैसी कोई शय सुलगती हुई उठ रहा है-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ धुआँ

है अनोखा समाँ ज़ेह्न के दरमियाँ आग जैसी कोई शय सुलगती हुई उठ रहा है धुआँ
आँसुओं की ज़बाँ, आशिक़ी, बेकसी की वही दास्ताँ  सुन रही हैं बयाँ गहरी ख़ामोशियाँ

रफ़्ता-रफ़्ता तिरी सम्त हम कुछ बढ़े, रफ़्ता रफ़्ता कहानी कुछ आगे बढ़ी, और फिर यूँ हुआ
तेज़ मोड़ आया नद्दी भंवर बन गयी नाव उलटने लगी आह पढ़ने लगी दर्द की दास्ताँ

अपनी ज़द में लिए पाँव को थी थकन राह दुश्वार थी दूर मंज़िल भी थी क़िस्सा आगे सुनो
ऐसे आलम में भी ख़ुद को यकजा किया, साथ अपना दिया और फिर यूँ हुआ छू लिया आसमाँ

देर से हों भले साधनाएं सफल सब्र का मीठा फल हमको मिलना है तय ये तो तारीख़ है
एक लम्हे में इक इक सदी का सफ़र, रौशनी, आशिक़ी, शायरी का सफ़र कब हुआ रायगाँ

हाँ इसी जिस्म में एक मन है जहाँ बस ज़रा देर बैठा इबादत हुई और फिर उसके बाद
मैं तिरे इश्क़ में आगे बढ़ने लगा मुझको मिलने लगीं जगमगाते हुए ख़्वाब की सीढ़ियाँ

मैं इबादत ज़रा भी नहीं जानता हाँ मगर तजरुबा ये हुआ बारहा बंद पलकें जो कीं
अपनी तन्हाई में मुझको अक्सर लगा जिस्म मस्जिद सा है दिल मोअज़्ज़िन है इक धड़कनें हैं अज़ाँ

है मियाँ शह्र की हर सड़क हर गली मेरी नापी हुई जांची परखी हुई पिछले औक़ात में
चल के आओगे तुम जिस किसी राह से अपने क़दमों तले ग़ौर से देखना कुछ मिलेंगे निशाँ

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ 09818354784

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6 comments on “है अनोखा समाँ ज़ेह्न के दरमियाँ आग जैसी कोई शय सुलगती हुई उठ रहा है-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ धुआँ

  1. Irshad bahi, apne kis bala ki ghazal kahi hai, Tareef lafzon men mumkin nahin. bahut bahut mubarakbad

  2. क्या बला की ग़ज़ल क्या गज़ब की ग़ज़ल जैसे दरिया सा बहता चले तेज़रौ
    इक मुसाफ़िर हो मंज़िल की जानिब कहीं दूर उफ़ुक़ की तरफ़ गामज़न रात दिन
    साथ जपता चले फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

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