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T-28/20 क्या कीजे इल्मो-फ़न के तलबगार मर गए-आसिफ़ अमान

हज़रते-मीर तकी मीर की ग़ज़ल, जिस ज़मीन को तरह किया गया

जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गए
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गए

होता नहीं है उस लबे-नौ-ख़त पे कोई सब्ज़
ईसा को खिज्र क्या सभी यक बार मर गए

यूँ कानो-कान गुल ने न जाना चमन में आह
सर को पटक के हम पसे-दीवार मर गए

सद कारवां वफ़ा है कोई पूछता नहीं
गोया मता-ए-दिल के ख़रीदार मर गए

मजनूँ न दश्त में है न फ़रहाद कोह मे
अफ़सोस वे शहीद कि जो क़त्ल-गाह में
लगते ही उसके हाथ कि तलवार मर गए

तुझसे दो चार होने की हसरत से मुब्तिला
जब जी हुए वबाल तो नाचार मर गए

घबरा के ‘मीर’ इश्क़ के उस सहल-ए-ज़ीस्त पर
जब बस चला न कुछ तो मेरे यार मर गए

————————————————-

आसिफ़ अमान साहब की तरही की ग़ज़ल

क्या कीजे इल्मो-फ़न के तलबगार मर गए
रक्खी हैं सब किताबें ख़रीदार मर गए

जीते रहे तो राएगां लगती रही हयात
अब मर के लग रहा है कि बेकार मर गए

इक उसकी मौत से ये कहानी का हश्र है
यूँ लग रहा है सारे ही किरदार मर गए

कहिये वो शेर जिसमें सरापा तिरा हो नज़्म
इस आरज़ू में सैकड़ों अशआर मर गए

उम्मीद उसके आने के इक ख़त्म क्या हुई
लगता है अपने जीने के आसार मर गए

दुनिया से इक शिकस्त उन्हें लग रही है मौत
ऐसे तो हम ‘अमान’ कईं बार मर गए

आसिफ़ अमान 08130599876

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13 comments on “T-28/20 क्या कीजे इल्मो-फ़न के तलबगार मर गए-आसिफ़ अमान

  1. Bahut achi gazal aman sahab

  2. Kharidaar mar gaye…. waah
    Asif ji umda gazal hui hae
    Mubarakbaad
    Sadar
    Pooja

  3. क्या कहने आसिफ भाई! दिल से दाद!

  4. jitni pyari Zameen hai utni hi pyari ghazal bhi hui bilkul apki tarah ..mubarakbaad

  5. भई वाह। आसिफ़ अमान साहब।
    हर शेर क़ाबिले तारीफ़।
    बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है।
    बधाई

  6. जीते रहे तो राएगां लगती रही हयात
    अब मर के लग रहा है कि बेकार मर गए

    इक उसकी मौत से ये कहानी का हश्र है
    यूँ लग रहा है सारे ही किरदार मर गए
    Bahut pyari gazal hui bhai jan
    Dili daad qubul kijiye

  7. जीते रहे तो राएगां लगती रही हयात
    अब मर के लग रहा है कि बेकार मर गए

    वाह आसिफ़ भाई..क्या कहने..

    बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल..मुबारक.

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