2 टिप्पणियाँ

T-28/14 टूट कें काँच की रकाबी से – नवीन

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल:-

उम्र भर हम रहे शराबी से
दिल-ए-पुरख़ूँ की, इक गुलाबी से

जी डूबा जाए है, सहर से, आह
रात गुजरेगी किस ख़राबी से

खिलना कम कम, कली ने सीखा है
उसकी आँखों की नीम ख़्वाबी से

बुर्क़ा उठते ही चाँद सा निकला
दाग़ हूँ उसकी बे-हिजाबी से

काम थे इश्क़ में बहुत, पर मीर
हम ही फ़ारिग़ हुए शिताबी से

********

नवीन सी• चतुर्वेदी की ब्रज-गजल:-

टूट कें काँच की रकाबी से
हम बिखर ही गए सराबी से

नेह के बिन सनेह की बतियाँ
ये दरस तौ हैं बस नवाबी से

हक्क तजबे कों नेंकु राजी नाँय
गम के तेवर हैं इनकिलाबी से

बैद, कोऊ तौ औसधी बतलाउ
घाव, गहराए हैं खराबी से

राख हियरे में खाक अँखियन में
अब कपोल’उ कहाँ गुलाबी से

प्रश्न बन कें उभर न पाये हम
बस्स, बन-बन, बने – जवाबी से

हमरे अँचरा में आए हैं इलजाम
बिन परिश्रम की कामयाबी से

ब्रज-गजल के प्रयास अपने लिएँ
सच कहें तौ हैं पेचताबी से

बस्स बदनौ* है, कच्छ करनों नाँय
हौ ‘नवीन’ आप हू किताबी से
*बोलना

:- नवीन सी चतुर्वेदी
+919967024593*******

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

2 comments on “T-28/14 टूट कें काँच की रकाबी से – नवीन

  1. NAVEEN SAHEB, YE KAMAL BHI AAP HI KAR SAKTE HAIN. MUBARAKBAD QUBOOL FARMAYEN

  2. kya hi achcha matla hai!! bharpoor ghazal Naveen bhai!! waaaaaaaah!!!

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: