16 टिप्पणियाँ

T-28/12 ”उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया”-तुफ़ैल चतुर्वेदी

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया

उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अहदे-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

सारे रिन्दो-बाश जहाँ के तुझसे सजुद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझको इमाम किया

सरज़द हम से बेअदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर-हर गाम किया

किसका क़िबला कैसा काबा कौन हरम है क्या अहराम
कूचे के उसके बाशिन्दों ने सबको यहीं से सलाम किया

ऐसे आहू-ए-रमख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सिहर किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझ को राम किया

याँ के सपेदो-सियाह में हमको दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुब्ह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया

सायदे-सीमीं दोनों उसके हाथ में लेकर छोड़ दिए
भूले उसके क़ौलो-क़सम पर हाय ख़याले-ख़ाम किया

शेख़ जो है मस्जिद में नंगा रात को था मयख़ाने में
जुब्बा, ख़िरक़ा, कुरता, टोपी नश्शे में इनआम किया

‘मीर’ के दीनो-मज़हब का अब पूछते क्या हो उनने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया

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तुफ़ैल चतुर्वेदी की तरही ग़ज़ल

”उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया”
ज़हर को फिर तिर्याक़ बनाया ख़ुद का काम तमाम किया

दीवाने की मस्ती का क्या दीवाना है उनने तो
अपने अश्क शराब बनाये अपने हाथ को जाम किया

तिल और उसके गाल के तिल जैसे दो जुड़वाँ जन्नत हों
बल्ख़-बुख़ारा की हस्ती क्या दुनिया को इनआम किया

सिर्फ़ फ़क़ीरी है जो अपनी है सो मैंने जीवन भर
अंग भभूत रमाई कफ़नी को अपना अहराम किया

ये इक सच्चे दोस्त का शेवा ही होता है तुमने भी
मेरी ख़ूबी ढंक कर रक्खी मेरी कमी को आम किया

दुनिया की नज़रों में आने का जब ढंग न सूझा कुछ
शुहरत की ख़ातिर उसने फिर ख़ुद को ही बदनाम किया

उसका ग़म ग़ज़लों में समो कर दुनिया भर से पायी दाद
दिल ने घर की चीज़ों को चौराहे पर नीलाम किया

क़तआ

सारे गुलाब सजाये अपने सारी सियाही हमारी की
अपने दिल को सुर्ख़ बनाया दर्द हमारे नाम किया

सुख की धूप, लपट, अकुलाहट अपने पास न आ पायी
दुख बरगद जैसा छतनार था छाँव तले बिसराम किया

दुख की आदत है जन्मों से सुख की आदत थी ही नहीं
छाँव ने मेरा जिस्म जलाया धूप ने छाँव का काम किया

तुफ़ैल चतुर्वेदी 09711296239-09810387857

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16 comments on “T-28/12 ”उल्टी हो गई सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया”-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. वाह खूब ………………………. वाह खूबसूरत ग़ज़ल हुई है वाह ////////////

  2. बिल्कुल आपके अपने मिज़ाज की ग़ज़ल हुई है दादा! लुत्फ़ आ गया!

  3. bahut sunder gazal kahi hai Chaturvediji
    duniya ki nazaron men aane ka jab dhang n kuchh sujha
    shuhrat ki khatir usne fir khud ko hi badnaam kiya
    ek sher aaj ke pure mahaul ka varnan kar deta hai. badhai
    aur dad sweekaren

  4. dhoonp ne chhaoN ka kaam kiya!!

    kya khoob ghazal hui hai Dada!!

    waaaaaaaah aur waaaaaaaah!!

  5. प्रणाम दादा
    क्या ही उम्दा ग़ज़ल हुई है। वाह वाह
    ढेर सारी दाद क़ुबूल फरमायें।
    सादर
    पूजा

  6. Dada pranaam

    Kya hi kamaal gazal hui hae….dheron dher daad qubool farmayein…
    Dil ne ghar ki chizon ko ……ye sher liye ja rahi huun.
    Sadar
    Pooja

  7. वाह !
    वाह !!
    और वाह !!!

    क्या ही कहने.
    पूरी ग़ज़ल ही कमाल है..

    प्रणाम.

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