15 टिप्पणियाँ

T-28/8 मुद्दआ ही खो गया नारों के बीच-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

हज़रते-मीर तक़ी मीर की वो ग़ज़ल जिसको तरही किया गया

काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच
हों जो रहमत के सज़ावारों के बीच

जी सदा उन अब्रुओं ही में रहा
की बसर हम उम्र तलवारों के बीच

चश्म हो तो आइनाख़ाना है दह्र
मुंह नज़र आता है दीवारों के बीच

हैं अनासिर की ये सूरत-बाज़ियाँ
शोबदे क्या क्या हैं उन चारों के बीच

जब से ले निकला है तू ये जिन्से-हुस्न
धूम पड़ जाती है बाज़ारों के बीच

आशिक़ी-ओ-बेकसी-ओ-रफ़्तगी
जी रहा कब ऐसे आज़ारों के बीच

जो सरिश्क उस माह बिन झमके है शब
वो चमक काहे को है तारों के बीच

यारो मत उसका फरेबे-मह्ऱ खाओ
‘मीर’ भी थे उसके ही यारों के बीच

—————————————

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ साहब की तरही ग़ज़ल

मुद्दआ ही खो गया नारों के बीच
घिर गये हम ज़ेह्नी-बीमारों के बीच

देख उनको आफ़रीं बोला फ़लक
चाँद सर धुनने लगा तारों के बीच

आख़िरश बिकने पे आमादा हुए
आ गये अब हम भी बाज़ारों के बीच

इक जहाँ की सैर को निकले थे हम
हो गये हैं दफ़्न दीवारों के बीच

अपने ईमाँ को परखने के लिये
रात हम बैठे गुनहगारों के बीच

तू न सह पाया हमारा एक वार
मुस्कुराये हम तिरे वारों के बीच

अब उजाला बाँटना है कारोबार
फँस गये हम लोग अंधियारों के बीच

काम आया आख़िरश अपना जुनूं
अक़्ल थी बेजान तलवारों के बीच

इक उतारा एक पहना सच कहें
खो गये हम इतने किरदारों के बीच

आइये कुछ वक़्त हम पैदल चलें
दम घुटा जाता है अब कारों के बीच

फेंकिये मज़हब, सियासत इक तरफ़
काम क्या इनका कलाकारों के बीच

हम “सिकन्दर” फंस गये दुनिया में यूँ
जूँ कोई राही झपटमारों के बीच

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ 09818354784

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15 comments on “T-28/8 मुद्दआ ही खो गया नारों के बीच-इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

  1. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है वाह ……………………….

  2. बहुत अच्छा सामयिक इरशाद भाई! बहुत खूब!

  3. इक उतारा एक पहना सच कहें
    खो गये हम इतने किरदारों के बीच

    क्या कहने इरशाद जी वाह….
    ढेरों दाद क़ुबूल कीजिये
    सादर
    पूजा

  4. ye ghazal aapse suni bhi thi aur ab padh kar bhi utna hi maza aaya!! waaaaaaaaaaah!!

  5. ख़ूबसूरत ग़ज़ल सिकंदर भाई. हर शेर ज़िह्ननशीं .ढेरों दाद और मुबारकबाद क़बूल कीजिये.
    “शाज़” जहानी

  6. आख़िरश बिकने पे आमादा हुए
    आ गये अब हम भी बाज़ारों के बीच

    इक जहाँ की सैर को निकले थे हम
    हो गये हैं दफ़्न दीवारों के बीच

    क्या कहने इरशाद भाई..
    हमेशा की तरह बेहतरीन ग़ज़ल.
    मुबारक.

  7. Asslam alaikum dada
    आख़िरश बिकने पे आमादा हुए
    आ गये अब हम भी बाज़ारों के बीच

    इक जहाँ की सैर को निकले थे हम
    हो गये हैं दफ़्न दीवारों के बीच
    Wahhhhhhh Wahhhhhhh dada
    Bahut pyari gazal hui
    Dili daad qubul kijiye
    Sadar

  8. Irshad bhai, hamesha ki trah umda ghazal, apke ashaar padhkar bahut achcha lagta hai. Daad qubool farmayen

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