18 टिप्पणियाँ

T-28/2 अक्स कितने आसमां लाता रहा-दिनेश नायडू

हज़रते-मीर तक़ी मीर की ज़मीन जिसमें ग़ज़ल कही गयी :-

इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
आख़िर अब दूरी में जी जाता रहा

मेह्र ओ माह गुल फूल सब थे पर हमें
चेहरई चेहरा ही वो भाता रहा

दिल हुआ कब इश्क़ की रह का दलील
मैं तो ख़ुद गुम ही उसे पाता रहा

मूँह दिखता बरसों वो ख़ुशरू नहीं
चाह का यूँ कब तलक नाता रहा

कुछ न मैं समझा जुनूनो-इश्क़ में
देर नासेह मुझको समझाता रहा

दाग़ था जो सर पे मेरे शम्म सा
पाँव तक मुझको वही खाता रहा

कैसे कैसे रुक गए हैं ‘मीर’ हम
मुद्दतों मूँह तक जिगर आता रहा

—————————————-

दिनेश नायडू साहब की तरही ग़ज़ल

अक्स कितने आसमां लाता रहा
कोई चेहरा ज़हन में आता रहा

रात मेरे सामने बैठी रही
मैं उसे इक ख़ाब दिखलाता रहा

चहचहाती आ गयी फिर से सहर
ख़ाब भी कल रात का जाता रहा

इक नदी बहती रही मद्धम कहीं
साथ में मल्लाह इक गाता रहा

नज़्म सी लगने लगी थी शाम भी
इक ख़याल आता रहा जाता रहा

कोई मिसरा शेर बन पाये, सो मैं
सिगरटें रह रह के सुलगाता रहा

जो कहानी में न गूंथा जा सके
मेरा उस किरदार से नाता रहा

दिनेश नायडू 09303985412

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18 comments on “T-28/2 अक्स कितने आसमां लाता रहा-दिनेश नायडू

  1. sigrateN KYUn
    biDiyaN KYUn nahiN

    KYA MEYYAR KA DAR THA

  2. अक्स कितने आसमां लाता रहा
    कोई चेहरा ज़हन में आता रहा

    रात मेरे सामने बैठी रही
    मैं उसे इक ख़ाब दिखलाता रहा

    दिनेश भाई..
    क्या ही कहने..कमाल की ग़ज़ल.

  3. nazm si lagne lagi thi sham bhi,++,ik khayal ataa raha jataa raha…………..kya haseen ashaar apne kahe hain. wah

  4. bohot behtareen gazal huyi Naidu Sahab!! Daad kubool farmayein.

  5. चहचहाती आ गयी फिर से सहर
    ख़ाब भी कल रात का जाता रहा

    इक नदी बहती रही मद्धम कहीं
    साथ में मल्लाह इक गाता रहा

    नज़्म सी लगने लगी थी शाम भी
    इक ख़याल आता रहा जाता रहावआह वाह लाज़वाब ग़ज़ल दिनेश नायडू साहेब कमाल के अशआर

  6. kya kahne dinesh bhai behtareen ashaar kahe aapne …

  7. रात मेरे सामने बैठी रही
    मैं उसे इक ख़ाब दिखलाता रहा
    Wahhhhhhh bhaia
    Bahut pyari gazal hui
    Dili daad qubul kijiye

  8. जनाब दिनेश नायडू जी,आदाब,बहुत ही मुरस्सा ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

    –समर कबीर

  9. वाह खूब ग़ज़ल कही है वाह …………

  10. नज़्म सी लगने लगी थी शाम भी
    इक ख़याल आता रहा जाता रहा

    कोई मिसरा शेर बन पाये, सो मैं
    सिगरटें रह रह के सुलगाता रहा

    जो कहानी में न गूंथा जा सके
    मेरा उस किरदार से नाता रहा …………बहुत सुंदर वाह आदरणीय दिनेश नायडू जी लाजवाब ग़ज़ल के लिये बधाई

  11. अक्स कितने आसमां लाता रहा
    कोई चेहरा ज़हन में आता रहा

    दिमाग़ बार-बार नए रंग दिखाता है, नए फूल खिलाता है मगर दिल उसी सम्त जाता है जिस सम्त को उसने मक़सद बनाया हुआ है। इस सच्चाई को किस क़दर ख़ूबसूरत ढंग से दिनेश साहब ने मत्ले में कहा है

    रात मेरे सामने बैठी रही
    मैं उसे इक ख़ाब दिखलाता रहा

    इस शेर में रात सियाह, उदास, निराश ज़िन्दगी है। हर उदासी को ख़त्म करने, हटाने की ललक का बयान, हालात को बदलने की अदम्य जिजीविषा का चित्रण, यही तरीक़ा तो ज़िन्दगी करने का है। करुण रस में उत्साह का शेड वाह वाह, ज़िंदाबाद। हर शेर उम्दा कहा गया है, पूरी ग़ज़ल अच्छी है। बया की उड़ान बाज़ की झपट में तब्दील होती दिखाई दे रही है। हज़ारों दाद

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